फिर जनम लेंगे हम, नसीमा






                     फिर जनम लेंगे हम, नसीमा

दक्षिण समाचार, 23 दिसंबर 1998

                                        तेलुगु मूल : पाटिबंडला रजनी
                          हिंदी अनुवाद : प्रो. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू
मानवहार बनी थीं
हम
डालकर गलबहियाँ
एक लय से
एक कदम से
मनुष्य और मनुष्य के हाथों में हाथ आने पर,
मन से मन मिलाकर
मिट्टी के सने परिमल से खुश हुई थीं।

अचरच हुआ था जानकर
हमारे जन्म से पूर्व
औलाद की आस में
जाने कितनी बार
तुम्हारी माँ ने
मंदिर के पीपल पर
झूले बाँधे
और
पीर के जलूस में
आँचल पसारा था
मेरी माँ ने
लेकिन नहीं किया था कुतर्क।

मेरी खातिर
तुम्हारे मजहब का मतलब
बीमारी के वक्त बाँधे गये
मस्जिद के पवित्र ताबीज
तुम्हारी खातिर
मेरे धर्म का अर्थ
मेरे साथ छोडी हुई
झिलमिल झिलमिल फुलझड़ियाँ।

याद है नसीमा
कितनी पसंद है मुझे
तुम्हारी माँग में चमकती हुई चमकी
और कितने पसंद है तुम्हें
मेरी रंग-बिरंगी बिंदी
तुम्हारी दो बानी-बेली की तरह
नारियल और शक्कर
मिला के खाते हुए
मीलों दूर चले जाते थे हम दोनों
और इसी तरह
मेरे अन्नमय्या, क्षेत्रय्या को गाते हुए
पिये थे हमने जाने कितने-कितने कलश।

क्या अर्थ था उन दिनों,
हमारे लिए भगवान का?
वही न!
जो राक्षसों को मारता था
मेरी दादी की सुनाई
काशी-यात्रा की कथाओं में
और तुम्हारी दादी की सुनाई
अरेबियन नाइटस की गाथाओं में।
लेकिन आज
 उस भगवान ने भी
सीख ली है राजनीति
उसके रथचक्र के नीचे दबकर,
चूर-चूर हो गयी हैं
सेंबई से भी नाजुक-सी लिपटी
स्नेह लताएँ
मांस के टुकडों में बिखरा पड़ा है मानवहार
आर.डी.एक्स, ए.के.47 के सिवा,
अब भला ताबीज और फुलझडियाँ कहाँ?
हमारी आँखों के सामने चमकी की चमक और
तलवार की चमक-दमक समान है अब।
कुछ फर्क नहीं रहा है
पोंछी गई बिंदी
और देवार्पित चेहरों में।
तुम सुनो या मैं सुनूँ
एक ही संगीत
जयश्रीराम अल्ला हो अकबर।
प्यारी दोस्त!
एक ही तरह जन्म लेकर
हजारों रास्तों में बँटी
मनुष्यों की भीड़ की अपेक्षा
करोंडों टुकड़े होने के बाद भी
एक ही आवाज देने वाली
डाँडिया रास की लकड़ी ही बेहतर है न?
कम-से-कम
अगले जन्म में
हम भी
इसी की तरह जन्म लेंगे, नसीमा!




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