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Sursagar, Gokul leela 73, जसुमति मन, अभिलाष करै। कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै। सूरदास

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  Sursagar, Gokul leela 73, जसुमति मन, अभिलाष करै। कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै। सूरदास आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं तथा माता यशोदा के वात्सल्य भाव का अत्यंत मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है. बालक कृष्ण अभी शैशवावस्था में हैं. उन्हें देखकर माता यशोदा के मन में एक स्नेहमयी माँ की स्वाभाविक इच्छाएँ जागृत होती हैं. वह अपने पुत्र के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को देखने के लिए उत्सुक हैं. इसी बीच कथा में एक नाटकीय मोड़ आता है , जब यशोदा कृष्ण को आँगन में छोड़कर घर के कार्य में व्यस्त हो जाती हैं और अचानक एक भयंकर आँधी उठती है. इसका वर्णन किस प्रकार किया है कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या अब देखेंगे. पद जसुमति मन , अभिलाष करै। कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै , कब धरनी पग द्वैक धरै। कब द्वै दाँत दूध के देखौं , कब तोतरैं मुख बचन झरै। कब नंदहि बाबा कहि बोलै , कब जननी कहि मोहिं ररै। कब मेरौ अँचरा गहि मोहन , जोइ-सोइ कहि मोसौं झगरै। कब धौं तनक-तनक...

Sri Ram Charit Manas, Bal kand 65, समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए । गोस्वामी तुलसीदास.

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Sursagar, Gokul leela 68, जसोदा हरि पालनैं झुलावै । हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै। सूरदास

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  Sursagar, Gokul leela 68, जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै। सूरदास आचार्य. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू. प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद कृष्ण की बाल-लीलाओं से संबंधित है. इसमें माता यशोदा के वात्सल्य भाव का अत्यंत मार्मिक एवं सजीव चित्रण किया गया है. माता यशोदा अपने नन्हे बालक कृष्ण को पालने में झुलाकर सुलाने का प्रयास कर रही हैं. वे लोरी गाती हैं , उसे दुलारती हैं और स्वयं नींद को बुलाकर अपने लाल को सुलाने का आग्रह करती हैं. इस पद में कवि ने मातृत्व के सहज , स्वाभाविक और मधुर भावों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है. साथ ही यह भी दिखाया है कि जिस परम ब्रह्म को देवता और ऋषि-मुनि भी प्राप्त नहीं कर सकते , वही भगवान कृष्ण माता यशोदा की गोद में किस प्रकार खेल रहे हैं, कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या अब देखेंगे. पद जसोदा हरि पालनैं झुलावै । हलरावै , दुलराइ मल्हावै , जोइ-सोइ कछु गावै । मेरे लाल कौं आउ निदँरिया , काहैं न आनि सुवावै । तू काहैं नहिं बेगहिं आवै , तोकौं कान्ह ब...

Sri Ram Charit Manas, Bal kand 64, सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर ॥ गोस्वामी तुलसीदास.

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Sursagar, Gokul leela 62, आनंदै आनंद बढ्‌यो अति। देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति। सूरदास

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  Sursagar, Gokul leela 62,  आनंदै आनंद बढ्‌यो अति।  देवनि दिवि दुंदभी बजाई , सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति। सूरदास. आचार्य. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू   प्रसंग              भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म (प्राकट्य) के अवसर का अत्यंत हर्षोल्लासपूर्ण वर्णन किया गया है. जब कंस के अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी , देवता और समस्त प्राणी भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना करते हैं , तब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा में देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में अवतरित होते हैं. उनके जन्म का समाचार सुनकर सम्पूर्ण सृष्टि आनंदमग्न हो उठती है. देवता , गंधर्व , किन्नर , विद्याधर , ऋषि-मुनि तथा समस्त देवांगनाएँ उत्सव मनाने लगती हैं. इस अलौकिक और दिव्य वातावरण का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किस प्रकार किया है, कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या अब देखेंगे. पद आनंदै आनंद बढ्‌यो अति । देवनि दिवि दुंदभी बजाई , सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति । विद्याधर-किन्नर कलोल मन उपजावत मिली कंठ अमित गति ...