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Sursagar, Gokul leela 80, Surdas, सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन-मंडित, मुख दधि लेप किये। गोकुल लीला - 80, सूरदास.

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Sursagar, Gokul leela 80, Surdas,  सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन-मंडित, मुख दधि लेप किये। गोकुल लीला  - 80,  सूरदास. आचार्य. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू. प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद बालकृष्ण के अनुपम सौन्दर्य और उनकी मनोहर बाल-लीलाओं का अत्यंत आकर्षक चित्रण प्रस्तुत करता है. सूरदास ने यहाँ बालकृष्ण को हाथ में मक्खन लिए हुए , घुटनों के बल चलते हुए तथा धूल और दधि से अलंकृत रूप में चित्रित किया है. यह चित्र केवल एक बालक का चित्र नहीं है , बल्कि भक्त के हृदय में बसे उस परम सौन्दर्य का दर्शन है , जिसके एक क्षण के साक्षात्कार को कवि अनंत जीवन से भी श्रेष्ठ मानता है. इस पद में वात्सल्य रस , माधुर्य भाव और कृष्णभक्ति का अद्भुत समन्वय का वर्णन किस प्रकार किया है, अब कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे. पद सोभित कर नवनीत लिए । घुटुरुनि चलत रेनु तन-मंडित , मुख दधि लेप किये । चारु कपोल , लोल लोचन , गोरोचन-तिलक दिये । लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहिं पिए । कठुला-कंठ , बज्र केहरि-नख , राजत र...

Sri Ram Charit Manas, Bal kand 67, कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सक। गोस्वामी तुलसीदास

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Sursagar, Gokulleela 79, Suradas. खेलत नन्द-आंगन गोबिंद। निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु। सूरदास

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  Sursagar, Gokulleela 79, Suradas. खेलत नन्द-आंगन गोबिंद। निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु। सूरदास. आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद बालकृष्ण की मनोहर बाल-छवि और उनकी आकर्षक बाल-लीलाओं का अत्यंत सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है. नन्द बाबा के आँगन में खेलते हुए बालकृष्ण के रूप , वेशभूषा , आभूषणों तथा उनकी चंचल बाल-गतिविधियों का वर्णन करते हुए कवि ने वात्सल्य रस का अद्भुत सृजन किया है. माता यशोदा अपने लाड़ले पुत्र की मोहक छवि को निहारकर अपार आनंद का अनुभव कर रही हैं. भगवान की बाल-लीलाएँ इतनी मनोमुग्धकारी हैं कि उन्हें देखकर बड़े-बड़े योगी और मुनि भी अपना योग एवं वैराग्य किस प्रकार भूल जाते हैं, आदि का वर्णन अब कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे. पद खेलत नन्द-आंगन गोबिंद । निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति , बदन मनोहर इंदु । कटि किंकिनी चंद्रिका मानिक , लटकन लटकत भाल । परम सुदेस कंठ केहरि-नख , बिच बिच बज्र प्रवाल । कर पहुँची , पाइनि मैं नूपुर , तन राजत पट पीत । घुटुरुनि ...

Sri Ram Charit Manas, Bal kand 66, सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब । गोस्वामी तुलसीदास

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Sursagar, Gokul leela 73, जसुमति मन, अभिलाष करै। कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै। सूरदास

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  Sursagar, Gokul leela 73, जसुमति मन, अभिलाष करै। कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै। सूरदास आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं तथा माता यशोदा के वात्सल्य भाव का अत्यंत मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है. बालक कृष्ण अभी शैशवावस्था में हैं. उन्हें देखकर माता यशोदा के मन में एक स्नेहमयी माँ की स्वाभाविक इच्छाएँ जागृत होती हैं. वह अपने पुत्र के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को देखने के लिए उत्सुक हैं. इसी बीच कथा में एक नाटकीय मोड़ आता है , जब यशोदा कृष्ण को आँगन में छोड़कर घर के कार्य में व्यस्त हो जाती हैं और अचानक एक भयंकर आँधी उठती है. इसका वर्णन किस प्रकार किया है कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या अब देखेंगे. पद जसुमति मन , अभिलाष करै। कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै , कब धरनी पग द्वैक धरै। कब द्वै दाँत दूध के देखौं , कब तोतरैं मुख बचन झरै। कब नंदहि बाबा कहि बोलै , कब जननी कहि मोहिं ररै। कब मेरौ अँचरा गहि मोहन , जोइ-सोइ कहि मोसौं झगरै। कब धौं तनक-तनक...