वृद्ध अस्मिता और हिंदी उपन्यास : ‘गिलिगडु’ और ‘रेहन पर रग्घू’ आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू
वृद्ध अस्मिता और हिंदी उपन्यास : ‘ गिलिगडु ’ और ‘ रेहन पर रग्घू ’ आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू International Journal of Hindi Research www.hindijournal.com ISSN: 2455-2232 Received: 28-06-2026, Accepted: 28-07-2026, Published: 12-08-2026 Volume 12, Issue 3, 2026, Page No. 147-151 DOI: https://doi.org/10.66856/ijhr.2026.12.3.12228 सारांश ( Abstract) समकालीन हिंदी साहित्य में वृद्ध-विमर्श तेजी से उभरता हुआ एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक-साहित्यिक विमर्श है , जो बदलते पारिवारिक संबंधों , सामाजिक संरचना , भूमंडलीकरण , नगरीकरण , उपभोक्तावाद तथा व्यक्तिवादी जीवन-दृष्टि के संदर्भ में वृद्धजनों की स्थिति का विश्लेषण करता है. भारतीय समाज में वृद्ध व्यक्ति परंपरागत रूप से अनुभव , ज्ञान , संस्कार और पारिवारिक मार्गदर्शन का केंद्र रहा है , किंतु संयुक्त परिवार के विघटन तथा आधुनिक जीवन-शैली के प्रभाव से उसकी सामाजिक भूमिका और पारिवारिक महत्ता में निरंतर परिवर्तन आया है. प्रस्तुत आलेख में चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘ गिलिगडु’ तथा काशीनाथ सिंह के ‘ रेहन पर रग्घू’ के विशेष संदर्भ में वृद्धावस्था ...