Sursagar, Gokul leela 105, कहत नन्द, जसुमति सौं बात। कहा जानिए कह तै देख्यौं, मेरैं कान्ह रिसात। सूरदास.

 Sursagar, Gokul leela 105,

कहत नन्द, जसुमति सौं बात। कहा जानिए कह तै देख्यौं, मेरैं कान्ह रिसात। सूरदास.

आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू.

प्रसंग

भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद कृष्ण की बाल-लीलाओं से संबंधित है. माटी-भक्षण प्रसंग तथा अन्य बाल-चेष्टाओं के कारण कभी-कभी माता यशोदा कृष्ण को डाँट देती हैं या उन्हें दंडित करने का प्रयास करती हैं. इस स्थिति को देखकर नन्द बाबा यशोदा को समझाते हैं कि कृष्ण अभी बहुत छोटे और कोमल बालक हैं. वे यशोदा को उनकी अत्यधिक ममता और कभी-कभी होने वाली कठोरता के बीच संतुलन रखने का उपदेश देते हैं. इस पद में नन्द के पितृस्नेह, यशोदा के वात्सल्य तथा कृष्ण की बाल-निष्कपटता का अत्यंत सुंदर चित्रण सूरदास जी ने किस प्रकार चित्रित किया है, अब सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे.

पद

कहत नन्द, जसुमति सौं बात ।
कहा जानिए कह तै देख्यौं, मेरैं कान्ह रिसात ।
पाँच बरष को मेरौ कन्हैया, अचरज तेरी बात ।
बिनहिं काज साँटि ले धावति, ता पाछे बिललात ।
कुसल रहैं बलराम स्याम दोउ, खेलत-खात-अन्हात ।
सूर स्याम कौं कहा लगावति, बालक कोमल गात ।105

शब्दार्थ

कहत  -  कहते हुए

जसुमति  -  यशोदा

सौं  -  से

कान्ह  -  कृष्ण

रिसात  -  क्रोधित होना

बरष  -  वर्ष

अचरज  -  आश्चर्य

बिनहिं काज  -  बिना कारण

साँटि  -  पतली छड़ी, डण्डी

धावति  -  दौड़ती है

बिललात  -  रोती है, विलाप करती है

कुसल  -  कुशल, मंगल

स्याम  -  कृष्ण

अन्हात  -  स्नान करते हुए

कहा लगावति  -  दोष लगाती है

कोमल गात  -  कोमल शरीर

व्याख्या

कहत नन्द, जसुमति सौं बात.
कहा जानिए कह तै देख्यौं, मेरैं कान्ह रिसात.
इस पद में सूरदास ने नन्द बाबा के वात्सल्यपूर्ण हृदय और कृष्ण के प्रति उनके स्नेह का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है.

नन्द बाबा यशोदा से कहते हैं कि वे समझ नहीं पाते कि आखिर उन्होंने कृष्ण को कब क्रोधित होते देखा है. वे यशोदा से पूछते हैं कि ऐसा कौन-सा अवसर आया जब कृष्ण ने कोई ऐसा व्यवहार किया हो जिसके कारण उन पर नाराज़ हुआ जाए. नन्द का कहने का आशय यह है कि कृष्ण स्वभाव से अत्यंत सरल, निष्कपट और प्रेममय बालक हैं, इसलिए उन पर क्रोध करना उचित नहीं है.

पाँच बरष को मेरौ कन्हैया, अचरज तेरी बात.
बिनहिं काज साँटि ले धावति, ता पाछे बिललात.
वे आगे कहते हैं कि कृष्ण अभी केवल पाँच वर्ष के छोटे-से बालक हैं. इतनी कम आयु के बालक के विषय में यशोदा कभी-कभी बड़ी आश्चर्यजनक बातें करने लगती हैं. यहाँ संकेत उस प्रसंग की ओर है जब यशोदा ने कृष्ण के मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दर्शन किया था. उस अद्भुत अनुभव के बाद भी कृष्ण उनके लिए एक साधारण बालक ही हैं, इसलिए नन्द उन्हें स्मरण कराते हैं कि कृष्ण को सामान्य बालक की दृष्टि से ही देखना चाहिए.

नन्द बाबा यशोदा की एक और प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं. वे कहते हैं कि कभी-कभी यशोदा बिना किसी विशेष कारण के हाथ में छड़ी लेकर कृष्ण को मारने दौड़ पड़ती हैं. परंतु जब बाद में कृष्ण की कोमलता और मासूमियत का स्मरण होता है, तब वही यशोदा स्वयं रोने और पछताने लगती हैं. यह चित्रण मातृत्व की स्वाभाविक मनोदशा को दर्शाता है, जहाँ माता कभी अनुशासन के लिए कठोर होती है और तुरंत बाद प्रेमवश स्वयं ही व्याकुल हो जाती है.

कुसल रहैं बलराम स्याम दोउ, खेलत-खात-अन्हात.
सूर स्याम कौं कहा लगावति, बालक कोमल गात.

नन्द बाबा आगे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनके दोनों पुत्र—बलराम और कृष्ण—सदैव कुशलपूर्वक रहें. वे खेलते रहें, खाते रहें, स्नान करते रहें और उनके जीवन में किसी प्रकार का दुःख या संकट न आए. यहाँ एक पिता की सबसे बड़ी आकांक्षा व्यक्त हुई है कि उसकी संतान स्वस्थ, प्रसन्न और सुरक्षित रहे.

अंत में सूरदास कहते हैं कि नन्द बाबा यशोदा को समझाते हुए कहते हैं कि कृष्ण का शरीर अत्यंत कोमल है. ऐसे मासूम और नाजुक बालक पर झूठा दोष लगाकर या बिना कारण उसे दंड देना उचित नहीं है. उनके शब्दों में केवल उपदेश नहीं, बल्कि पिता के हृदय का गहरा प्रेम और करुणा झलकती है.

इस प्रकार इस पद में नन्द बाबा का वात्सल्य, यशोदा की मातृ-संवेदना और कृष्ण की निष्कपट बाल-छवि एक साथ उभरकर सामने आती है.

विशेषताएँ

1.  नन्द बाबा के पितृ-स्नेह का सुंदर चित्रण, माता यशोदा की वात्सल्यपूर्ण मनोवृत्ति का यथार्थ वर्णन, बालकृष्ण की निष्कपटता और कोमलता का चित्रण और पारिवारिक जीवन की स्वाभाविक घटनाओं का सुंदर प्रस्तुतीकरण हुआ है.

2.   पूरे पद में वात्सल्य रस का अत्यंत सुंदर एवं स्वाभाविक प्रवाह है. नन्द और यशोदा दोनों के हृदय में कृष्ण के प्रति अपार प्रेम दिखाई देता है.

3.  यशोदा का कृष्ण को डाँटने के बाद स्वयं पछताना करुण भाव उत्पन्न करता है.

4.  नन्द बाबा की वाणी में एक पिता का संरक्षण, चिंता और प्रेम स्पष्ट रूप से झलकता है.

5.  कृष्ण को बालक के रूप में चित्रित करते हुए भी उनके दिव्य स्वरूप की अप्रत्यक्ष झलक मिलती है.

6.  माता का कभी कठोर और कभी अत्यधिक स्नेहमयी हो जाना, पिता का बच्चे का पक्ष लेना, बालक की मासूमियत पर माता-पिता का मुग्ध होना और संतान की कुशलता के लिए माता-पिता की चिंता आदि से युक्त यह पद पारिवारिक मनोविज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है.

7.  "खेलत-खात-अन्हात" में ध्वनि-सौंदर्य के कारण अनुप्रास अलंकार है.

8.  क्रियाओं की क्रमिक पुनरावृत्ति से भाव की तीव्रता बढ़ी है. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है.

9.  "अचरज तेरी बात" में आश्चर्य को विशेष रूप से उभारकर व्यक्त किया गया है. अतिशयोक्ति अलंकार है.

10.ब्रजभाषा का अत्यंत मधुर और सरस संवादात्मक शैली, सहज, स्वाभाविक और लोकजीवन के निकट भावप्रधान एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया गया है.

11. यह पद सूरदास की वात्सल्य-वर्णन कला का उत्कृष्ट उदाहरण है.

पारिवारिक जीवन के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पक्षों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है.

12. नन्द और यशोदा दोनों के वात्सल्य का संतुलित चित्रण मिलता है.

13. कृष्ण की बाल-लीलाओं को मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर प्रस्तुत करता है.

14. प्रस्तुत पद में सूरदास ने नन्द बाबा और यशोदा के माध्यम से माता-पिता के स्नेह, चिंता और वात्सल्य का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है. नन्द बाबा यशोदा को समझाते हैं कि कृष्ण अभी छोटे और कोमल बालक हैं, इसलिए उन्हें बिना कारण दंडित नहीं करना चाहिए. उनकी वाणी में एक पिता का गहन प्रेम और संतान के प्रति चिंता स्पष्ट दिखाई देती है. यह पद वात्सल्य रस, पारिवारिक मनोविज्ञान और कृष्णभक्ति का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है तथा सूरदास की बाल-लीला वर्णन-कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है.


 

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