Sursagar, Gokul leela 84, सिखवति चलन जसोदा मैया । अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया। सूरदास
Sursagar, Gokul leela 84, सिखवति चलन जसोदा मैया ।अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया । सूरदास
आचार्य एस. वी. एस. एस. नारायण राजू
प्रसंग
भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत
पद में बालकृष्ण की बाल-लीलाओं तथा माता यशोदा के वात्सल्य-भाव का अत्यंत
स्वाभाविक और मार्मिक चित्रण किया गया है. बालकृष्ण अब घुटनों के बल चलने की
अवस्था से आगे बढ़कर अपने पैरों से चलना सीख रहे हैं. माता यशोदा उन्हें चलना
सिखाती हैं, उनके
गिरने की चिंता करती हैं, उनके सुंदर मुख को देखकर बलैयाँ
लेती हैं और उनके दीर्घायु होने की कामना करती हैं. कवि ने इस पद में मातृत्व की
सहज भावनाओं तथा बालकृष्ण की मोहक बाल-चेष्टाओं का अत्यंत मनोहारी चित्र किस
प्रकार प्रस्तुत किया है. अब कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या
देखेंगे.
पद
सिखवति
चलन जसोदा मैया।
अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया।
कबहुँक सुंदर बदन विलोकति, उर आनंद भरि लेत
बलैया।
कबहुँक कुल देवता मनावति, चिरजीवहु मेरौ कुँवर
कन्हैया।
कबहुँक बल कौं टेरि बुलावति, इहिं आँगन खेलौ
दोउ भैया।
सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप बिलसत नँदरैया
.।84।
शब्दार्थ
सिखवति
- सिखाती है
चलन
- चलना
जसोदा
- यशोदा
अरबराइ
- घबराकर, जल्दी से
कर - हाथ
गहावत
- पकड़ लेती है
डगमगाइ
- लड़खड़ाते हुए
धरनी
- धरती, पृथ्वी,
भूमि
पैया
- पैर
कबहुँक
- कभी-कभी
विलोकति
- देखती है
उर
- हृदय
बलैया
- बलि लेना, नज़र उतारना
कुल
देवता - परिवार के आराध्य देव
मनावति
- प्रार्थना करती है
चिरजीवहु
- दीर्घायु हो
कुँवर
- राजकुमार, पुत्र
बल कौं - बलराम को
टेरि
- पुकारकर
दोउ भैया - दोनों भाई
बिलसत
- आनंदित होना,
उल्लसित होना
नंदरैया
- नन्द बाबा
व्याख्या
सिखवति
चलन जसोदा मैया.
अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया.
इस पद में सूरदास ने
माता यशोदा के वात्सल्य-स्नेह और बालकृष्ण की बाल-चेष्टाओं का अत्यंत हृदयस्पर्शी
चित्रण किया है.
कवि कहते हैं कि माता यशोदा अपने प्रिय पुत्र कृष्ण को चलना सिखा रही
हैं. कृष्ण अभी छोटे बालक हैं और अपने पैरों पर संतुलन बनाना सीख रहे हैं. जब वे
डगमगाते हुए छोटे-छोटे कदम धरती पर रखते हैं, तब माता यशोदा के मन में चिंता उत्पन्न हो जाती है कि
कहीं उनका लाल गिर न जाए. इसलिए वे घबराकर तुरंत उसका हाथ पकड़ लेती हैं. यह दृश्य
किसी भी माँ की स्वाभाविक ममता और संरक्षण की भावना को व्यक्त करता है.
कबहुँक
सुंदर बदन विलोकति, उर आनंद भरि लेत बलैया.
कबहुँक कुल देवता मनावति, चिरजीवहु मेरौ कुँवर
कन्हैया.
जब कृष्ण धीरे-धीरे
चलने का प्रयास करते हैं, तब माता यशोदा उनके सुंदर मुखमंडल को एकटक निहारती रहती हैं. उनके मुख की
मधुर मुस्कान, निष्कपटता और मोहकता को देखकर यशोदा का हृदय
आनंद से भर उठता है. प्रेम और वात्सल्य के आवेग में वे अपने पुत्र की बलैयाँ लेने
लगती हैं, ताकि किसी की बुरी दृष्टि उस पर न लगे. यह भारतीय
लोकजीवन की एक अत्यंत सामान्य और भावपूर्ण परंपरा है.
माता यशोदा केवल पुत्र के सौन्दर्य पर ही मुग्ध नहीं हैं, बल्कि उसकी रक्षा और
कल्याण के लिए भी सदैव चिंतित रहती हैं. इसलिए वे समय-समय पर अपने कुलदेवता की
आराधना करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि उनका प्रिय पुत्र कृष्ण दीर्घायु हो,
स्वस्थ रहे और सदा सुखी रहे. यहाँ एक माँ की स्वाभाविक चिंता और
उसके हृदय की शुभकामनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है.
कबहुँक
बल कौं टेरि बुलावति, इहिं आँगन खेलौ दोउ भैया.
सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप बिलसत नँदरैया.
कभी-कभी यशोदा बलराम को भी पुकारकर बुलाती हैं. वे चाहती हैं कि दोनों
भाई साथ-साथ खेलें, जिससे कृष्ण को सहारा भी मिले और उनका मनोरंजन भी हो. वे प्रेमपूर्वक कहती
हैं कि दोनों भाई इसी आँगन में खेलें. यह दृश्य पारिवारिक प्रेम, भाईचारे और घरेलू सौहार्द का सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है.
अंतिम चरण में सूरदास कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की ये बाल-लीलाएँ
अत्यंत अद्भुत और आनंददायक हैं. उनकी प्रत्येक चेष्टा में दिव्यता और आकर्षण छिपा
हुआ है. इन लीलाओं को देखकर न केवल माता यशोदा, बल्कि नन्द बाबा भी अत्यंत प्रसन्न और आनंदित होते
हैं. उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख अपने पुत्र की इन बाल-चेष्टाओं का दर्शन करना है.
कवि सूरदास जी यहाँ एक गहरे आध्यात्मिक सत्य की ओर भी संकेत करते हैं
जिस परमात्मा के दर्शन के लिए ऋषि-मुनि कठोर तपस्या करते हैं, वही भगवान कृष्ण बालक
बनकर यशोदा के हाथ पकड़कर चलना सीख रहे हैं. यह ईश्वर की भक्तवत्सलता और प्रेम की
महिमा का अद्भुत उदाहरण है.
विशेषताएँ
1. बालकृष्ण के चलना सीखने की अवस्था का
स्वाभाविक चित्रण, माता यशोदा के वात्सल्य एवं ममता का सजीव निरूपण के साथ – साथ पारिवारिक
प्रेम और भाईचारे की भावना का सुंदर प्रस्तुतीकरण किया है.
2. भगवान के बालरूप की दिव्यता और माधुर्य का
सुंदर वर्णन किया है.
3. इस पद में वात्सल्य रस अपने चरम रूप में अभिव्यक्त
हुआ है. यशोदा की चिंता, प्रेम, स्नेह और शुभकामनाएँ वात्सल्य रस को अत्यंत
प्रभावशाली बनाती हैं.
4. कवि कृष्ण को परमात्मा मानते हुए भी
उन्हें बालक के रूप में चित्रित करते हैं, जिससे भक्ति और वात्सल्य का अद्भुत समन्वय उत्पन्न
होता है.
5. बलराम और कृष्ण के साथ खेलने का प्रसंग
पारिवारिक प्रेम और भाईचारे को उजागर करता है.
6. माँ की स्वाभाविक चिंता कि कहीं बच्चा गिर
न जाए, बच्चे की छोटी-छोटी उपलब्धियों से माता का प्रसन्न होना, संतान की दीर्घायु
के लिए प्रार्थना करना, भाई-बहनों के साथ खेलने की पारिवारिक इच्छा, ये सभी भाव
अत्यंत यथार्थ और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सटीक हैं.
7. "डगमगाइ धरनी
धरे" में ध्वनियों की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार है.
8. "कबहुँक" शब्द की
बार-बार पुनरावृत्ति से लय और भाव की वृद्धि हुई है. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है.
9. "अति प्रताप बिलसत
नंदरैया" में कृष्ण-लीला के आनंद को विशेष रूप से बढ़ाकर व्यक्त किया गया है.
अतिशयोक्ति अलंकार है.
10. ब्रजभाषा का मधुर, सरल, स्वाभाविक, सरस और भावपूर्ण अभिव्यक्ति, गेयता और
संगीतात्मकता से युक्त शैली के साथ-साथ लोकजीवन और पारिवारिक वातावरण का सहज
चित्रण प्रस्तुत किया है.
11. यह पद सूरदास की वात्सल्य-वर्णन कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
12. मातृत्व की कोमल भावनाओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त
करता है.
13. कृष्ण की बाल-लीलाओं के माध्यम से भक्त और भगवान के मधुर संबंध को
उजागर करता है.
14. ब्रज संस्कृति, मातृ-स्नेह और कृष्णभक्ति का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है.
15. प्रस्तुत पद में सूरदास ने माता यशोदा द्वारा बालकृष्ण को चलना
सिखाने के प्रसंग को अत्यंत मार्मिकता और स्वाभाविकता के साथ चित्रित किया है.
यशोदा की चिंता, स्नेह,
बलैयाँ लेना, कुलदेवता से प्रार्थना करना तथा
बलराम को बुलाकर दोनों भाइयों को साथ खेलने के लिए कहना मातृत्व की महानता को
दर्शाता है. भगवान कृष्ण की ये बाल-लीलाएँ केवल मनोरंजक नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और वात्सल्य के दिव्य स्वरूप का
दर्शन कराती हैं. यही कारण है कि यह पद वात्सल्य रस की दृष्टि से सूरदास के
सर्वश्रेष्ठ पदों में गिना जाता है.
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