फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आँचल’: आंचलिक समाज और संस्कृति का प्रतिबिंब

 


फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आँचल’: आंचलिक समाज और संस्कृति का प्रतिबिंब

आचार्य. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू


बहुमुखी,

भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान पत्रिका,

Peer Reviewed Research Journal,

वार्षिक, अंक – 2/26,

Website – sahityapratishthan.org

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का उपन्यासमैला आँचल’ हिंदी साहित्य की आंचलिक परंपरा में एक मील का पत्थर माना जाता है. इसे केवल एक मनोरंजनपरक कथा नहीं, बल्कि एक गहन सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जाता है. रेणु ने इस उपन्यास में उत्तर-पूर्वी बिहार के ग्रामीण जीवन को जिस सजीवता और यथार्थता के साथ प्रस्तुत किया है, वह भारतीय ग्रामीण समाज की मूल संरचना, समस्याएँ और संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती है.

 ‘मैला आँचल’ हिंदी उपन्यास परंपरा में आंचलिक उपन्यास की परिकल्पना को स्थापित करता है. इसमें वर्णित पात्र, बोली-बानी, रीति-रिवाज, त्योहार और लोकगीत सब कुछ उस क्षेत्र विशेष की अस्मिता और लोकसंस्कृति को प्रकट करते हैं. रेणु ने अपनी भाषा-शैली में क्षेत्रीय शब्दों और मुहावरों का प्रयोग करके इसे जीवन्त और स्वाभाविक बनाया है.

उपन्यास का केंद्र पूर्णिया जनपद का मेरीगंज गाँव है. यह गाँव उस समय के ग्रामीण भारत की अनेक विडम्बनाओं और यथार्थताओं का दर्पण है. यहाँ गरीबी और भुखमरी से त्रस्त लोग महामारी और अशिक्षा से जूझते दिखाई देते हैं. जातिगत विषमताएँ, अंधविश्वास और रूढ़ियाँ उनके सामाजिक जीवन को जकड़े हुए हैं. इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, ग्रामीण समाज की धड़कनों में भविष्य की आशाएँ और परिवर्तन की आकांक्षाएँ भी अंकित हैं.

इस उपन्यास में लोकगीतों, पर्व-त्योहारों, मेलों, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं के माध्यम से आंचलिक संस्कृति की जीवंतता प्रकट होती है. यहाँ लोकजीवन में जहाँ आस्था और सामूहिकता का उत्सवमय रंग है, वहीं सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों की गहरी जकड़न भी दिखाई देती है. मैला आँचल केवल सामाजिक और सांस्कृतिक यथार्थ के चित्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता-उत्तर भारत की राजनीतिक चेतना को भी उद्घाटित करता है. गांधीवादी आदर्शों, समाजवादी विचारधारा और सत्ता-संघर्ष की जटिलताएँ गाँव की धरती पर स्पष्ट रूप से आकार लेती हैं. फणीश्वरनाथ रेणु ने मैला आँचल का शीर्षक सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘भारत माता’ से लिया है, कविता कुछ इस प्रकार है कि - भारत माता / ग्रामवासिनी. / खेतों में फैला है श्यामल / धूल भरा मैला सा आँचल”. (1)

इस पंक्ति में सुमित्रानंदन पंत ने भारत माता को ग्रामीण जीवन और उसके संघर्षों से जोड़कर प्रस्तुत किया है. ‘मैला सा आँचल’ भारतीय ग्राम्य जीवन की कठिनाइयों, गरीबी और संघर्ष का प्रतीक है. यही प्रतीक फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल के लिए प्रेरणा बना. रेणु ने इस शब्द को अपनाकर न केवल गाँव की मिट्टी और वहाँ के लोगों के जीवन को चित्रित किया, बल्कि ग्रामीण समाज की वास्तविकताओं, अंधविश्वास, गरीबी, महामारी और सामाजिक असमानता को भी उपन्यास में समाहित किया है. जिसमें भारतीय मातृभूमि की पीड़ा और संघर्ष को चित्रित किया गया है. पंत की कविता में ‘ग्रामवासिनी’ भारत माता का चित्रण किया गया है, जो ‘खेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मैला सा आँचल’ के रूप में प्रस्तुत है. यहाँ मैला आँचलभारतीय ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों, गरीबी और संघर्ष का प्रतीक है. रेणु ने इस शीर्षक को अपनाकर भारतीय ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं को उजागर किया है. उनका उद्देश्य था कि उपन्यास के माध्यम से भारतीय समाज की गहरी समस्याओं, जैसे गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास और सामाजिक असमानता को सामने लाया जाए. ‘मैला आँचल’ शब्द न केवल भारतीय मातृभूमि की व्यथा का प्रतीक है, बल्कि यह उपन्यास में वर्णित गाँव की मिट्टी, वहाँ के लोगों की मेहनत और संघर्ष को भी दर्शाता है.

फणीश्वरनाथ रेणु का उपन्यास मैला आँचल हिन्दी साहित्य में आंचलिक उपन्यास की परंपरा का एक प्रारंभिक और अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण माना जाता है. उपन्यास की भूमिका में स्वयं रेणु ने इसे स्पष्ट करते हुए लिखा कि - यह है मैला आंचल, एक आंचलिक उपन्यास.”..... “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी- मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया. कथा की सारी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ साहित्य की दहलीज पर आ खड़ा हुआ हूँ; पता नहीं अच्छा किया या बुरा. जो भी हो, अपनी निष्ठा में कभी महसूस नहीं करता.” (2) यह कथन उपन्यासकार की पूर्ण निष्ठा और यथार्थवाद को दर्शाता है. रेणु ने न केवल गाँव के सौंदर्य और सादगी को चित्रित किया है, बल्कि उसके कष्ट, गरीबी, अंधविश्वास और सामाजिक समस्याओं को भी बिना किसी छिपाव के प्रस्तुत किया. उनकी यह दृष्टि उपन्यास को केवल कथा के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन का भी दस्तावेज़ बनाती है.

मैला आँचल’ के पात्र केवल काल्पनिक चरित्र नहीं हैं, बल्कि वास्तविक जीवन से उठाए गए प्रतीकात्मक रूप हैं. डॉक्टर प्रशांत जैसे पात्र सामाजिक चेतना और नये युग के परिवर्तन के वाहक हैं, जबकि अन्य पात्र परंपरा, रूढ़ि और अंधविश्वास से बंधे ग्रामीण मानस को उजागर करते हैं. इनके माध्यम से रेणु ने न केवल समस्याओं का चित्रण किया है, बल्कि उनके समाधान की दिशा भी इंगित की है.

रेणु का यह उपन्यास स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के ग्रामीण भारत की राजनीतिक चेतना का भी दस्तावेज है. इसमें स्वतंत्रता आंदोलन की गूँज, लोकतंत्र की प्रारंभिक चुनौतियाँ और ग्रामीण नेतृत्व की उभरती भूमिका दिखाई देती है. लोकगीतों, लोककथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का सजीव चित्रण इसे मात्र साहित्यिक कृति न बनाकर एक सांस्कृतिक इतिहास का साक्ष्य बना देता है.

आंचलिकता की अवधारणा केवल किसी विशेष भू-भाग का भौगोलिक चित्रण नहीं है, बल्कि वहाँ के संपूर्ण जीवन की जीवंतता को उभारना है. मधुरेश ने इस संदर्भ में लिखा है - “इस अंचल के सम्पूर्ण अंतर्बाह्य व्यक्तित्व को वे सम्पूर्ण निष्ठा ही वस्तुतः अपने लिए चुन गए अंचल से लेखक को एक रागात्मक और आत्मीय सूत्र से जोड़ती है. यह रागात्मकता उत्कट रूप धारणा करने पर उस अंचल के प्रति एक रोमानी भावावेश में भी बदलती दिखाई देती है........ उस अंचल के नेतृत्व शास्त्रीय वैशिष्ट्य से लेकर उसका भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक एवं लोक-तात्विक चरित्र, वेश-भूषा, राग-रंग, उत्सव-त्योहार आदि सब कुछ अपनी समग्रता और जीवंतता में उपस्थित रहता है.” (3) यह वर्णन उपन्यास में आंचलिकता की व्यापकता और गहराई को उजागर करता है. मधुरेश के अनुसार, रेणु ने केवल भौगोलिक या भौतिक परिवेश का चित्रण नहीं किया, बल्कि उस अंचल के सामाजिक, सांस्कृतिक और लोक-जीवन के सभी पहलुओं को जीवंत रूप में पाठक के सामने प्रस्तुत किया. यह रागात्मक और आत्मीय दृष्टि पाठक को उस अंचल के साथ भावनात्मक और संवेदनात्मक रूप से जोड़ती है. उपन्यासकार की यह दृष्टि आंचलिकता को केवल स्थान या समय तक सीमित नहीं रहने देती, बल्कि उसे एक संपूर्ण अनुभव और राष्ट्रीय जीवन की सूक्ष्म झलक के रूप में प्रस्तुत करती है. गाँव के नेतृत्व, रीति-रिवाज, उत्सव, वेश-भूषा और लोक-परंपराएँ सभी एक समग्र चित्र का हिस्सा बन जाती हैं, जो उपन्यास की प्रामाणिकता और सौंदर्य को और भी गहरा बनाती हैं.

मैला आँचल की कथावस्तु मेरीगंज अंचल के परिचय से शुरू होता है. यह गाँव पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और नेपाल की सीमा से लगा हुआ है. बरसात में कमला नदी बह जाती है. पानी के जमाव के कारण चारों तरफ बीमारी फैल जाती है. विशेषकर मलेरिया, कालाजार, हैजा आदि से ग्रस्त अंचलों का वर्णन उपन्यास में हुआ है. मेरीगंज में विभिन्न टोलियाँ है. इनमें राजपूत और कायस्थ प्रमुख जातियाँ हैं. यादवों का दल भी जोर पकड़ रहा है. सारे मेरीगंज में दस आदमी थोड़े से पढ़े लिखे हैं. गाँव के तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद प्रभावशाली व्यक्ति है. अपने प्रतिद्वंद्वी रामकिरपाल सिंह से सब कुछ लूट लेता है और जमींदार बन जाता है. बाद में तहसीलदार पद से इस्तीफा दे देता है. मेरीगंज में बालदेव के अथक प्रयास से मलेरिया सेंटर खुलता है. भवन निर्माण में गाँव के सभी लोग सहयोग देते हैं. देशभक्त डॉ प्रशांत कुमार निरंतर गाँव के सुख-दुःख में सम्मिलित होते हैं. वे गाँव की प्रत्येक समस्या को सुलझाने का प्रयास करते हैं. तहसीलदार की बेटी कमला का इलाज करते समय उसके प्रेम में पड़ जाते हैं. प्रशांत का स्वभाव ऐसा है कि उसका जीवन मानो केवल प्रेम के लिए ही बना हो. वह अपने कर्तव्यों से भी उतना ही लगाव रखता है, जितना कमला से. पार्वती की माँ के प्रति उसका स्नेह भी उतना ही गहरा है, जितना डॉ. ममता के प्रति उसका अपनापन. संबंधों की गहरी संवेदनशीलता के कारण वह सभी से प्रभावित होता है और सभी से प्रेम करता है. वह एक स्थान पर कहता भी है कि - “प्राणों में घुले हुए रंगों का मोह आधे दिन में ही नहीं टूट सकता.” (4) प्रशांत का जीवन गाँव की समस्याओं को सुलझाने और वहाँ के लोगों को जागरूक बनाने में बीतता है. वह बीमारी, गरीबी और अज्ञानता से जूझते ग्रामीणों को राहत देने का निरंतर प्रयास करता है. मेरीगंज में राजनीतिक हलचलों का भी प्रभाव दिखाई देता है. कांग्रेस की सभाओं, नेताओं के भाषणों और स्वतंत्रता आंदोलन की गूँज से गाँव के लोग प्रभावित होते हैं. गाँव में तरह-तरह की जातीय टोलियों और गुटबाज़ी का चित्रण भी हुआ है, जो सामाजिक विघटन और संघर्ष को दर्शाता है. इसी पृष्ठभूमि में रेणु ने गाँव की स्त्रियों की स्थिति, उनकी पीड़ा और संवेदनाओं को भी अभिव्यक्त किया है. कमला, ममता और पार्वती की माँ जैसे पात्र मानवीय रिश्तों की गहराई और करुणा को सामने लाते हैं. डॉ. प्रशांत इन सब संबंधों में प्रेम और आत्मीयता खोजते हैं. वे केवल चिकित्सक ही नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन के सच्चे सहभागी बन जाते हैं.

 रेणु का मैला आँचल गाँव के यथार्थ जीवन और उसके सामाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश को बड़े सजीव रूप में प्रस्तुत करता है. उनका चित्रण केवल पात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि गाँव के वातावरण, नदी-नालों, खेतों और लोगों के जीवन से जुड़ा है. इस संदर्भ में, मेरीगंज का वर्णन उपन्यास में गाँव की वास्तविकता को प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है - “मेरीगंज एक बड़ा गाँव है, बारहो बरन के लोग रहते हैं. गाँव के पूरब एक धारा है जिसे कमला नदी कहते हैं. बरसात में कमला भर जाती है, बाकी मौसम में बड़े-बड़े गढ़ों में पानी जमा रहता है.” (5)  यह विवरण न केवल भौगोलिक स्थिति को स्पष्ट करता है, बल्कि पाठक को गाँव के जीवन के वास्तविक परिवेश से भी परिचित कराता है. रेणु ने गाँव की जलवायु, भौगोलिक ढांचा और यहाँ के लोगों की जीविका को इस तरह प्रस्तुत किया है कि पाठक स्वयं उस अंचल में मौजूद होने का अनुभव करता है. इसी प्रकार का सजीव चित्रण मैला आँचल को आंचलिक उपन्यास के रूप में विशिष्ट बनाता है, जहाँ गाँव केवल पृष्ठभूमि नहीं बल्कि कहानी का एक सक्रिय पात्र बन जाता है.

फणीश्वरनाथ रेणु ने मेरीगंज की सामाजिक संरचना का यथार्थ चित्रण करते हुए वहाँ प्रचलित अंधविश्वासों पर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया है. यह तथ्य स्पष्ट है कि जिन क्षेत्रों में आर्थिक विकास सीमित रहा तथा आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा का पर्याप्त प्रसार नहीं हो सका, वहाँ सामाजिक जीवन परंपरागत अंधविश्वासों के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता. रेणु ने बार-बार यह उद्घाटित किया है कि अंधविश्वास सामाजिक प्रगति के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते हैं. उपन्यास में डॉ. प्रशांत के प्रयत्न ग्राम्य जीवन को उन्नति की दिशा में ले जाने के लिए हैं, किंतु जोतखी काका जैसे पात्र इन अंधविश्वासों से प्रेरित होकर उनके प्रयासों का प्रतिरोध करते हैं. उनका कहना है, “डाक्टर लोग ही रोग फैलाते हैं. सुई भोंककर देह में जहर दे देते हैं, आदमी हमेशा के लिए कमजोर हो जाता है. हैजा के समय कुँओं में दवा डाल देते हैं, गाँव का गाँव हैजा से समाप्त हो जाता है.” (6) यह उद्धरण ग्रामीण अंधविश्वास और चिकित्सा संबंधी भ्रांतियों की व्यापकता को स्पष्ट करता है. रेणु ने दिखाया है कि कैसे पारंपरिक सोच और अनजाने डर के कारण वैज्ञानिक उपायों का विरोध होता है और स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण समस्याएँ गंभीर रूप धारण कर लेती हैं. उपन्यास में यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे समाज के विकास में बाधा के रूप में उपस्थित होता है. इस प्रकार, रेणु की दृष्टि केवल घटनाओं और पात्रों तक सीमित नहीं रहती; वह ग्रामीण समाज की मानसिकता, उसके भय और विश्वास, और सामाजिक प्रगति में इनके प्रभाव को भी उद्घाटित करती है. डॉ. प्रशांत और जोतखी काका के बीच यह टकराव ग्रामीण जीवन में परिवर्तन और परंपरा के संघर्ष का प्रतीक बन जाता है, जिससे पाठक ग्राम्य जीवन की जटिलताओं और उसकी वास्तविक चुनौतियों को गहराई से समझ पाता है.

इस प्रकार, फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल हिन्दी साहित्य में आंचलिक उपन्यास परंपरा की नींव रखने वाली महत्त्वपूर्ण कृति है. इस उपन्यास में केवल कथा-संरचना या प्रेम प्रसंग ही नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज का व्यापक यथार्थ, उसकी समस्याएँ, संघर्ष और सांस्कृतिक जीवंतता चित्रित हुई है. रेणु ने मेरीगंज गाँव को केंद्र बनाकर उत्तर-पूर्वी बिहार के जीवन की ऐसी झांकी प्रस्तुत की है, जिसमें लोकगीत, पर्व-त्योहार, अंधविश्वास, जातिगत विषमता, बीमारी और राजनीतिक हलचलें सब साथ-साथ चलती हैं. यह उपन्यास ग्रामीण जीवन की सुंदरता और सरलता के साथ-साथ उसकी दरिद्रता, पीड़ा और विडंबनाओं को भी सामने रखता है. रेणु की दृष्टि कहीं भी आडंबरपूर्ण नहीं है; वे गाँव की मिट्टी, वहाँ की खुशबू और वहाँ के कष्ट सबको ईमानदारी से उकेरते हैं. यही कारण है कि मैला आँचल केवल साहित्यिक आनंद की कृति नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी बन जाता है. डॉ. प्रशांत जैसे पात्रों के माध्यम से रेणु ने यह दिखाया कि बदलाव और प्रगति की राह कठिन अवश्य है, किंतु प्रेम, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्य ही उसके आधार हैं. अंधविश्वास और वैज्ञानिक चेतना के बीच टकराव, जातीय खींचतान और राजनीतिक उथल-पुथल, सबके बीच यह उपन्यास भारतीय ग्रामीण जीवन की संपूर्ण गाथा कहता है.

अतः कहा जा सकता है कि मैला आँचल भारतीय उपन्यास साहित्य में एक मील का पत्थर है, जो न केवल आंचलिकता का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है, बल्कि स्वतंत्रता-उत्तर भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन का यथार्थ प्रतिबिंब भी है. इस उपन्यास में चित्रित समस्याएँ और संघर्ष आज भी हमारी सामाजिक संरचना में विद्यमान हैं.

इस प्रकार, ‘मैला आँचल’ केवल कथा-रस का आस्वाद कराने वाला उपन्यास नहीं है, बल्कि उत्तर-पूर्वी बिहार के ग्रामीण जीवन का संपूर्ण समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक दस्तावेज है. रेणु की आंचलिक दृष्टि ने इसे हिंदी उपन्यास परंपरा में अद्वितीय स्थान दिलाया है और यह आज भी आंचलिकता की सर्वोत्तम और आधारभूत मिसाल के रूप में माना जाता है. यही कारण है कि यह उपन्यास समय की सीमा को लाँघकर आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने प्रकाशन-काल में था.

 

संदर्भ :

1.  ग्राम्या, सुमित्रानंदन पंत, पृ. - 76

2.  मैला आँचल, भूमिका, फणीश्वरनाथ रेणु.

3.  मधुरेश : हिन्दी उपन्यास का विकास. पृ. – 139

4.  मैला आँचल, फणीश्वरनाथ रेणु. पृ. -154

5.  मैला आँचल, फणीश्वरनाथ रेणु. पृ.–14

6.  रेणु का है अन्दाजे बयाँ, भारत यायावर. पृ.-127

संदर्भ ग्रंथ :

1.  ग्राम्या, सुमित्रानंदन पंत, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1977.

2.  मैला आँचल,फणीश्वरनाथ रेणु, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007.

3.  मधुरेश : हिन्दी उपन्यास का विकास, लोक भारती, इलाहाबाद, 2004.

4.  मैला आँचल, फणीश्वरनाथ रेणु, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992.

5.  रेणु का है अन्दाजे बयाँ, भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014.


  

 

 


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