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Showing posts from 2026

Sursagar, Gokul leela 106, मैया री, मोहिं माखन भावै। जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै। सूरदास

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  Sursagar, Gokul leela 106,  मैया री, मोहिं माखन भावै। जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै। सूरदास   आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू. प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण की प्रसिद्ध माखन-लीला से संबंधित है. बालकृष्ण को माखन अत्यंत प्रिय है. माता यशोदा उन्हें मेवा , मिठाई और विविध पकवान खाने के लिए प्रेरित करती हैं , किन्तु कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उन्हें केवल माखन ही अच्छा लगता है. उसी समय एक गोपी यह वार्तालाप सुन लेती है और उसके मन में यह अभिलाषा जागती है कि काश! कृष्ण उसके घर भी माखन चुराने आएँ और वह उन्हें चोरी-चोरी माखन खाते हुए देख सके. भगवान कृष्ण अंतर्यामी हैं , इसलिए वे गोपी के मन की इस छिपी हुई इच्छा को जान लेते हैं. इस पद में कृष्ण की बाल-लीला , गोपी की भक्ति तथा भगवान की भक्तवत्सलता का अत्यंत सुंदर चित्रण किस प्रकार किया है, अब सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे. पद मैया री , मोहिं माखन भावै। जो मेवा पकवान कहति तू , मोहिं नहीं रुचि आवै। ब्रज-जुवती इक पाछै ठाढ़ी ,...

Sri Ram Charit Manas, Bal kand 293, सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि॥ गोस्वामी तुलसीदास

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  Sri Ram Charit Manas, Bal kand 293, सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि॥ गोस्वामी तुलसीदास

Sursagar, Gokul leela 105, कहत नन्द, जसुमति सौं बात। कहा जानिए कह तै देख्यौं, मेरैं कान्ह रिसात। सूरदास.

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  Sursagar, Gokul leela 105, कहत नन्द, जसुमति सौं बात। कहा जानिए कह तै देख्यौं, मेरैं कान्ह रिसात । सूरदास. आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू. प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद कृष्ण की बाल-लीलाओं से संबंधित है. माटी-भक्षण प्रसंग तथा अन्य बाल-चेष्टाओं के कारण कभी-कभी माता यशोदा कृष्ण को डाँट देती हैं या उन्हें दंडित करने का प्रयास करती हैं. इस स्थिति को देखकर नन्द बाबा यशोदा को समझाते हैं कि कृष्ण अभी बहुत छोटे और कोमल बालक हैं. वे यशोदा को उनकी अत्यधिक ममता और कभी-कभी होने वाली कठोरता के बीच संतुलन रखने का उपदेश देते हैं. इस पद में नन्द के पितृस्नेह , यशोदा के वात्सल्य तथा कृष्ण की बाल-निष्कपटता का अत्यंत सुंदर चित्रण सूरदास जी ने किस प्रकार चित्रित किया है, अब सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे. पद कहत नन्द , जसुमति सौं बात । कहा जानिए कह तै देख्यौं , मेरैं कान्ह रिसात । पाँच बरष को मेरौ कन्हैया , अचरज तेरी बात । बिनहिं काज साँटि ले धावति , ता पाछे बिललात । कुसल रहैं बलराम स्याम दोउ , खेलत-खात-अन्हात । सूर स्याम क...

Sri Ram Charit Manas, Bal kand 292, पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर ॥ गोस्वामी तुलसीदास

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Sri Ram Charit Manas, Bal kand 292, पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर ॥ गोस्वामी तुलसीदास    

Sursagar, Gokul leela 99, खेलन दूरि जात कत कान्हा । आजु सुन्यौ मैं हाऊ आयौ, तुम नहिं जानत नान्हा। सूरदास

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  Sursagar, Gokul leela 99,  खेलन दूरि जात कत कान्हा । आजु सुन्यौ मैं हाऊ आयौ, तुम नहिं जानत नान्हा। सूरदास. आचार्य एस. वी. एस. एस. नारायण राजू प्रसंग भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद बालकृष्ण की बाल-लीलाओं और माता यशोदा के वात्सल्य-भाव का अत्यंत स्वाभाविक चित्रण करता है. बालकृष्ण अपने सखाओं के साथ दूर वन में खेलने जाना चाहते हैं , परंतु माता यशोदा उनके प्रति अत्यधिक स्नेह और चिंता के कारण उन्हें दूर जाने से रोकना चाहती हैं. इसलिए वे बालकों को डराने के लिए "हाऊ" (हौवा या काल्पनिक डरावना प्राणी) की कहानी सुनाती हैं. इस पद में मातृत्व की सुरक्षा-भावना , बालकों की सरलता तथा पारिवारिक स्नेह का अत्यंत सुंदर चित्रण कवि सूरदास जी ने किस प्रकार किया है, अब सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे. पद खेलन दूरि जात कत कान्हा । आजु सुन्यौ मैं हाऊ आयौ , तुम नहिं जानत नान्हा । इक लरिका अबहिं भजि आयौ , रोवत देख्यौ ताहि । कान तोरि वह लेत सबनि के , लरिका जानत जाहि । चलौ न , बेगि सबारै जैये , भाजि आपनैं धाम । सूर स्याम यह बात सुन...