Sri Ram Charit Manas, Lanka kand 104, पति सिर देखत मंदोदरी । मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥ जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आईं ॥ गोस्वामी तुलसीदास
Sri Ram Charit Manas, Lanka kand 104, पति सिर देखत मंदोदरी । मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥ जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आईं ॥ गोस्वामी तुलसीदास
पति
सिर देखत मंदोदरी । मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥
जुबति
बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आईं ॥
पति के
सिर देखते ही मन्दोदरी व्याकुल और मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़ी। स्त्रियाँ
रोती हुई उठ दौड़ीं और उस (मन्दोदरी) को उठाकर रावण के पास आयीं ॥ १॥
पति
गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा।।
उर
ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना।।
पति की
दशा देखकर वे पुकार-पुकार कर रोने लगीं। उनके बाल खुल गये, देह की सँभाल नहीं रही। वे अनेकों प्रकार
से छाती पीटती हैं और रोती हई रावण के प्रताप का बखान करती हैं ॥ २ ॥
तव बल
नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥
सेष
कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥
वे
कहती हैं कि हे नाथ! तुम्हारे बल से पृथ्वी सदा काँपती रहती थी। अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन
थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूल में भरा हुआ
पृथ्वी पर पड़ा है ! ॥ ३ ॥
बरुन कुबेर
सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा ॥
भुजबल
जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥
वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इन में से किसी ने भी रण में तुम्हारे
सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुज बल से काल और यमराज को भी
जीत लिया था। वही तुम आज अनाथ की तरह पड़े हो ॥ ४ ॥
जगत
बिदित तुम्हारि प्रभुताई । सुत परिजन् बल बरनि न जाई॥
राम बिमुख
अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥
तुम्हारी
प्रभुता जगत् भर में प्रसिद्ध है। तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियों के बल का हाय!
वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामचन्द्र जी के विमुख होने से ही तुम्हारी ऐसी
दुर्दशा हुई कि आज कुल में कोई रोनेवाला भी न रह गया ॥ ५ ॥
तव बस
बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥ अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम
बिमुख यह अनुचित नाहीं॥
हे
नाथ! विधाता की सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको
मस्तक नवाते थे। किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं। श्रीराम
विमुख के लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात् उचित ही है) ॥६॥
काल
बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना॥
हे
पति ! काल के पूर्ण वश में होने से तुमने [किसी का] कहना नहीं माना और चराचर के
नाथ परमात्मा को मनुष्य करके जाना ॥७॥
छं० -
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।
जेहि
नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं।
आजन्म
ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।
तुम्हहू
दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥
दैत्य
रूपी वन को जलाने के लिये अग्नि स्वरूप साक्षात् श्रीहरि को तुमने मनुष्य करके
जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान् को हे प्रियतम! तुमने
नहीं भजा। तुम्हारा यह शरीर जन्म से ही दूसरों से द्रोह करने में तत्पर तथा पाप समूहमय
रहा! इतने पर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीराम जी ने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ।
दो० -
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि
बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥104॥
अहह! नाथ! श्रीरघुनाथ जी के समान कृपा का समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन भगवान् ने तुमको वह गति दी जो योगि समाज को भी दुर्लभ है ॥
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