“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल”। - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
Sri Ram Charit Manas, Lanka kand 102, काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।। मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा । राम बिभीषन तन तब देखा ॥ गोस्वामी तुलसीदास
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Sri Ram Charit Manas, Lanka kand 102, काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।। मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा । राम बिभीषन तन तब देखा ॥ गोस्वामी तुलसीदास
Sri Ramcharitmanas – Lanka Kand, Pad 102
The Final Moment of the Rama–Ravana Battle
Welcome to this spiritual journey through Goswami Tulsidas’s Sri Ramcharitmanas. In this episode, we explore Lanka Kand, Pad 102, one of the most dramatic and decisive moments in the great battle between Lord Sri Rama and Ravana.
The battle has reached its climax. Whenever Lord Rama cuts off Ravana’s heads, they multiply again and again. Tulsidas beautifully compares this to greed increasing with every new gain. Despite repeated attacks, Ravana does not die, and the prolonged battle becomes increasingly intense.
At this crucial moment, Lord Rama looks towards Vibhishana, who reveals the secret of Ravana’s extraordinary strength. He explains that nectar is stored in Ravana’s navel, and as long as it remains there, Ravana cannot be defeated.
Goswami Tulsidas reminds us that Lord Rama, the Supreme Lord who can destroy even Time itself merely by His will, already knows everything. Yet He allows such moments to unfold in order to reveal the devotion, loyalty and wisdom of His devotees.
As Lord Rama prepares for the final attack, ominous signs appear throughout the universe. Jackals and dogs cry, birds make fearful sounds, comets become visible in the sky, the directions seem to burn, the earth trembles, violent winds blow, and clouds rain blood, hair and dust. Even Mandodari’s heart trembles, sensing the approaching destruction of Ravana.
Seeing the gods terrified by these dreadful portents, the compassionate Lord Raghunatha takes up His mighty bow. Drawing the bowstring up to His ears, He releases thirty-one powerful arrows.
Tulsidas presents these divine arrows as if they were deadly serpents of Time itself, rushing towards Ravana and announcing the inevitable triumph of Dharma over Adharma.
This profound episode teaches us that pride, greed and unrighteous power may appear invincible for a time, but they cannot survive before truth, divine justice and righteous leadership.
Join us as we experience this magnificent moment from Sri Ramcharitmanas – Lanka Kand, Pad 102, where the final destruction of Ravana draws near and the victory of righteousness becomes inevitable.
काटत
बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।
मरइ न
रिपु श्रम भयउ बिसेषा । राम बिभीषन तन तब देखा ॥
काटते
ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं और
परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा ॥ १ ॥
उमा
काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥
[शिवजी
कहते हैं- हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। [विभीषणजीने कहा- हे सर्वज्ञ ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये ॥ २॥
नाभिकुंड
पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें ॥
सुनत
बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला ॥
इसके
नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये ॥ ३॥
असुभ
होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना।।
उस
समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे। जगत्के दुःख (अशुभ) को सूचित करने के लिये पक्षी बोलने
लगे। आकाश में जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये॥४॥
दस
दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥ मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा
स्रवहिं नयन मग बारी॥
दसों
दिशाओं में अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व (योग) के सूर्य ग्रहण
होने लगा। मन्दोदरी का हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्ग से जल बहाने
लगीं ॥ ५॥
छं० -
प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।
बरषहिं
बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥
उतपात
अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए।
सुर
सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥
मर्तियाँ
रोने लगीं. आकाश से वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी. पृथ्वी
हिलने लगी, बादल
रक्त, बाल
और धूलकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमंगल होने लगे कि उनको कौन कह सकता
है? अपरिमित
उत्पात देखकर आकाश में देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओं को भयभीत
जानकर कृपालु श्रीरघुनाथ जी धनुष पर बाण सन्धान करने लगे।
दो०-
खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस ।
रघुनायक
सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥102॥
कानों तक धनुष को खींच कर श्रीरघुनाथ जी ने इकतीस बाण
छोड़े। वे श्रीरामचन्द्र जी के बाण ऐसे चले मानो काल सर्प हों ॥
हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श : पहचान , संघर्ष और सांस्कृतिक संदर्भ आचार्य एस.वी.एस.एस.नारायण राजू 21वीं सदी को हिंदी कथा साहित्य में किन्नर विमर्श, डॉ. मिलन बिष्नोई. प्रकाशन वर्ष 2025, ISBN No. 978-93-48200-09-9 भारतीय समाज में किन्नर समुदाय का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों , पुराणों और महाकाव्यों तक मिलता है. महाभारत में शिखंडी का चरित्र हो या रामायण में श्रीराम के अयोध्या लौटने पर किन्नरों का स्वागत – यह समुदाय सांस्कृतिक इतिहास में सदैव मौजूद रहा है. किंतु आधुनिक समय तक आते-आते किन्नरों की छवि केवल हाशिए पर खड़े , उपेक्षित और उपहास का पात्र बने समूह की तरह गढ़ दी गई. साहित्य में किन्नर विमर्श का उदय इस ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक असमानता के प्रतिकार के रूप में देखा जा सकता है. यह विमर्श उनकी उपस्थिति को समाज के केंद्र में लाकर उन्हें ' वस्तु ' या ' हास्य ' नहीं बल्कि मानव के रूप में चित्रित करता है. पिछले दो दशकों में हिंदी कथा-साहित्य और उपन्यासों में किन्नर जीवन के विविध आयाम सामने आए हैं. जैसे - कथाकारों के उपन्यास और कहानियाँ किन्नरों की आंतरिक पीड़ा ,...
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