Sri Ram Charit Manas, Ayodhya kand 108, सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने ॥ तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा ॥ गोस्वामी तुलसीदास

 

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने ॥


Comments

Popular posts from this blog

हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श : पहचान, संघर्ष और सांस्कृतिक संदर्भ

“कबीर के दृष्टिकोण में गुरु”

कोमल गांधार में चित्रित “गांधारी” के विभिन्न आयाम