Sursagar, Gokul leela 98, मैया मौहिं दाउ बहुत खिजायौ ।मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौं, तू जसुमति कब। सूरदास
Sursagar, Gokul leela 98, मैया मौहिं दाउ बहुत खिजायौ। मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौं, तू जसुमति कब जायौ। सूरदास
आचार्य एस. वी. एस. एस. नारायण राजू
प्रसंग
भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत
पद बालकृष्ण की प्रसिद्ध बाल-लीलाओं में से एक है. इसमें बालकृष्ण अपने बड़े भाई
बलराम (दाऊ) की शिकायत लेकर माता यशोदा के पास आते हैं. बलराम और अन्य ग्वाल बालक
कृष्ण को यह कहकर चिढ़ाते हैं कि यशोदा उनकी वास्तविक माता नहीं हैं, बल्कि उन्हें कहीं से
खरीदकर लाया गया है. बाल सुलभ सरलता और निष्कपटता के कारण कृष्ण इन बातों को सच
मानकर दुखी हो जाते हैं और अपनी माँ से शिकायत करते हैं. इस पद में सूरदास ने
बाल-मनोविज्ञान, वात्सल्य-भाव तथा पारिवारिक स्नेह का अत्यंत
स्वाभाविक एवं मनोरम चित्रण किस प्रकार किया है, अब कवि सूरदास जी के शब्दों में
पद और पद की व्याख्या देखेंगे.
पद
मैया मौहिं दाउ बहुत खिजायौ ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौं, तू जसुमति कब जायौ ।
कहा करौं इहि रिस के मारैं खेलन हौं नहिं जात ।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात ।
गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात ।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत, हँसत सबै मुसुकात ।
तू मोहिं कौ मारन सीखी, दाउहिं कबहूँ न खीझै ।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि
रीझै ।
सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही को धूत ।
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं, हौं माता तू पूत ।98।
शब्दार्थ
मैया - माँ
मौहिं - मुझे
दाउ - बलराम
खिजायो - चिढ़ाया, परेशान किया
मोल कौ लीन्हौं - खरीदकर लिया है
जसुमति - यशोदा
रिस - क्रोध
तात - पिता
स्यामल गात -
साँवला शरीर
चुटकी दै-दै - चुटकी बजा-बजाकर
ग्वाल - ग्वाल बालक
मुसुकात - मुस्कुराते हैं
खीझै - डाँटती, नाराज़ होती
रीझै - प्रसन्न होती है
बलभद्र - बलराम
चबाई - चुगलखोर, बात बनाने वाला
धूत - धूर्त, शरारती
गोधन - गायों का धन
सौं - शपथ
पूत - पुत्र
व्याख्या
मैया मौहिं दाउ बहुत खिजायौ.
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौं, तू जसुमति कब जायौ.
कहा करौं इहि रिस के मारैं खेलन हौं नहिं जात.
बालकृष्ण अपनी माता
यशोदा के पास आकर शिकायत करते हैं कि उनके बड़े भाई बलराम उन्हें बहुत चिढ़ाते हैं.
वे कहते हैं कि दाऊ उनसे बार-बार कहता है कि यशोदा उनकी सगी माँ नहीं हैं, बल्कि उन्हें कहीं से
खरीदकर लाया गया है. कृष्ण की बाल-सुलभ बुद्धि इस बात को सुनकर भ्रमित हो जाती है
और वे सचमुच चिंतित हो उठते हैं.
कृष्ण कहते हैं कि दाऊ की इन बातों से उन्हें इतना क्रोध और दुःख होता
है कि वे खेलने तक नहीं जाते. उन्हें भय रहता है कि यदि वे खेलने गए तो बलराम और
अन्य ग्वालबाल फिर उनका उपहास करेंगे. यहाँ कवि ने बालक के कोमल मन की संवेदनशीलता
का अत्यंत यथार्थ चित्रण किया है.
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात.
गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात.
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत, हँसत सबै मुसुकात.
कृष्ण आगे बताते हैं
कि बलराम बार-बार उनसे पूछते हैं कि उनकी माता कौन है और उनके पिता कौन हैं. वह
तर्क देता है कि नन्द बाबा गोरे हैं, माता यशोदा भी गोरी हैं, फिर
कृष्ण का शरीर साँवला क्यों है? यदि वे वास्तव में
नन्द-यशोदा के पुत्र होते तो उनका रंग भी माता-पिता जैसा होता. बालकृष्ण इन बातों
को सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं.
कृष्ण शिकायत करते हैं कि केवल बलराम ही नहीं, बल्कि अन्य ग्वाल बालक भी
उन्हें चुटकी बजा-बजाकर चिढ़ाते हैं और हँसते हैं. वे सब मिलकर उनका मज़ाक उड़ाते
हैं. इस कारण कृष्ण को बहुत अपमान और दुःख का अनुभव होता है.
तू मोहिं कौ मारन सीखी, दाउहिं कबहूँ न खीझै.
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि
रीझै.
कृष्ण अपनी शिकायत
को और आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि माता यशोदा भी उन्हें ही डाँटती हैं, जबकि बलराम को कभी कुछ
नहीं कहतीं. उनके बाल मन में यह शंका उत्पन्न हो जाती है कि कहीं वास्तव में वे
यशोदा के पुत्र नहीं हैं और इसलिए माँ केवल उन्हें ही डाँटती हैं. यह बालक की
स्वाभाविक मानसिक प्रतिक्रिया है, जो अपने प्रति समान प्रेम
और न्याय की अपेक्षा रखता है.
माता यशोदा कृष्ण के मुख से निकली हुई ये भोली-भाली शिकायतें सुनकर
भीतर-ही-भीतर प्रसन्न होती हैं. उन्हें अपने पुत्र की सरलता और मासूमियत पर स्नेह
उमड़ आता है. किंतु वे यह भी समझती हैं कि कृष्ण वास्तव में दुखी हैं, इसलिए वे उन्हें समझाने
का प्रयास करती हैं.
सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही को धूत.
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं, हौं माता तू पूत.
यशोदा कहती हैं कि बलराम तो जन्म से ही शरारती और धूर्त है. उसकी
बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए. वह तो केवल मज़ाक कर रहा था. इसके बाद वे कृष्ण
को पूर्ण विश्वास दिलाने के लिए गोधन (गायों) की शपथ लेकर कहती हैं कि वे ही उनकी
वास्तविक माता हैं और कृष्ण उनके ही पुत्र हैं.
यशोदा की यह बात सुनकर कृष्ण का सारा संदेह दूर हो जाता है. यहाँ
सूरदास ने मातृत्व की उस महान शक्ति का चित्रण किया है, जो बच्चे के मन के सारे
भय और संदेहों को एक ही क्षण में दूर कर देती है.
विशेषताएँ
1. बालकृष्ण की भोली-भाली शिकायत का चित्रण, बलराम
और कृष्ण के भाई-भाई संबंध का स्वाभाविक प्रस्तुतीकरण और बाल-मनोविज्ञान का अत्यंत
यथार्थ वर्णन के साथ-साथ माता यशोदा के वात्सल्य और ममता का प्रभावशाली चित्रण
प्रस्तुत किया है.
2. पूरे पद में वात्सल्य रस की प्रधानता है. माता यशोदा का स्नेह और कृष्ण की
निष्कपटता हृदय को स्पर्श करती है.
3. बलराम द्वारा कृष्ण को चिढ़ाना तथा ग्वाल बालकों
का हँसना हास्य का सृजन करता है.
4. कृष्ण का दुखी होना और अपनी माँ से शिकायत
करना करुणा का भाव उत्पन्न करता है.
5. कवि ने परमात्मा को एक सामान्य बालक के
रूप में प्रस्तुत करके भक्तिभाव को और अधिक मधुर बना दिया है.
6. इस पद की सबसे बड़ी विशेषता इसका बच्चे का
अपनी पहचान को लेकर संवेदनशील होना, उपहास से दुखी होना, माता-पिता के प्रेम में
समानता की अपेक्षा रखना, माँ के आश्वासन से तुरंत संतुष्ट हो जाना, ये सभी
स्थितियाँ बाल-स्वभाव की स्वाभाविक अभिव्यक्तियाँ हैं. इस प्रकार कवि ने उत्कृष्ट
बाल-मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है.
7. "गोरे नंद जसोदा
गोरी" में वर्णों की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार है.
8. "पुनि-पुनि",
"दै-दै" में पुनरुक्ति का सुंदर प्रयोग हुआ है. पुनरुक्ति
प्रकाश अलंकार है.
9. ग्वालबालों के व्यवहार का बढ़ा-चढ़ाकर
वर्णन बाल-सुलभ शिकायत को प्रभावशाली बनाता है. अतिशयोक्ति अलंकार है.
10. ब्रजभाषा का मधुर एवं सरस रूप, संवादात्मक
शैली, सहज, स्वाभाविक
और लोकजीवन से जुड़ी भाषा और भावों के अनुरूप सरल एवं प्रभावी अभिव्यक्ति का सफल
प्रयोग किया है.
11. बाल-मनोविज्ञान के चित्रण की दृष्टि से यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण
है.
12. सूरदास की वात्सल्य-वर्णन कला का श्रेष्ठ उदाहरण है.
13. कृष्ण को मानवीय रूप में चित्रित करने की कवि की अद्भुत क्षमता का
परिचायक है.
14. भक्तिकालीन कृष्ण-साहित्य में यह पद विशेष लोकप्रियता रखता है.
15. प्रस्तुत पद में सूरदास ने बालकृष्ण की सरलता, निष्कपटता और भावुकता का
अत्यंत मनोहर चित्रण किया है. बलराम द्वारा चिढ़ाए जाने पर कृष्ण का दुखी होकर
माता यशोदा के पास शिकायत करना तथा यशोदा का उन्हें प्रेमपूर्वक समझाकर आश्वस्त
करना मातृत्व और बाल्यावस्था दोनों की स्वाभाविक भावनाओं को उजागर करता है. इस पद
में वात्सल्य, हास्य, करुणा और भक्ति
का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है. यही कारण है कि यह पद सूरदास की सर्वाधिक
लोकप्रिय बाल-लीला रचनाओं में से एक माना जाता है.
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