Sursagar, Gokul leela 106, मैया री, मोहिं माखन भावै। जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै। सूरदास
Sursagar, Gokul leela 106,
मैया री, मोहिं माखन भावै। जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै। सूरदास
आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू.
प्रसंग
भक्तिकाल
के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण की
प्रसिद्ध माखन-लीला से संबंधित है. बालकृष्ण को माखन अत्यंत प्रिय है. माता यशोदा
उन्हें मेवा, मिठाई
और विविध पकवान खाने के लिए प्रेरित करती हैं, किन्तु कृष्ण
स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उन्हें केवल माखन ही अच्छा लगता है. उसी समय एक गोपी यह
वार्तालाप सुन लेती है और उसके मन में यह अभिलाषा जागती है कि काश! कृष्ण उसके घर
भी माखन चुराने आएँ और वह उन्हें चोरी-चोरी माखन खाते हुए देख सके. भगवान कृष्ण
अंतर्यामी हैं, इसलिए वे गोपी के मन की इस छिपी हुई इच्छा को
जान लेते हैं. इस पद में कृष्ण की बाल-लीला, गोपी की भक्ति
तथा भगवान की भक्तवत्सलता का अत्यंत सुंदर चित्रण किस प्रकार किया है, अब सूरदास
जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे.
पद
मैया री, मोहिं माखन भावै।
जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै।
ब्रज-जुवती इक पाछै ठाढ़ी, सुनत श्याम की बात।
मन-मन कहति कबहुं अपनैं घर, देखौं माखन खात।
बैठे जाइ मथनियाँ कैं ढिग, मैं 'तब रहौं छपानी।
सूरदास प्रभु अंतरजामीं ग्वालिनि मन की जानी।106।
शब्दार्थ
मैया री
- हे माँ
मोहिं -
मुझे
माखन
- मक्खन
भावै
- अच्छा लगता है
मेवा
- सूखे फल, स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ
पकवान
- मिठाइयाँ एवं
विशेष व्यंजन
रुचि
- पसंद
ब्रज-जुवती - ब्रज की
युवती, गोपी
पाछै
ठाढ़ी
- पीछे खड़ी हुई
श्याम
- कृष्ण
मन-मन
- मन ही मन
अपनैं
- अपने
मथनियाँ
- दही मथने का स्थान
अथवा मथनी
ढिग
- पास
छपानी
- छिपी हुई
अंतरजामीं
- सब के मन की बात
जानने वाला
ग्वालिनि
- गोपी
व्याख्या
मैया री, मोहिं माखन भावै.
जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै.
इस पद में सूरदास ने
बालकृष्ण की माखन-प्रियता तथा गोपियों के प्रेममय भक्ति-भाव का अत्यंत मधुर चित्रण
किया है.
बालकृष्ण
अपनी माता यशोदा से कहते हैं कि उन्हें माखन बहुत प्रिय है. यशोदा उन्हें बार-बार
मेवा, मिठाइयाँ और स्वादिष्ट
पकवान खाने के लिए कहती हैं, परंतु कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते
हैं कि इन वस्तुओं में उनकी कोई रुचि नहीं है. उन्हें तो केवल ताज़ा माखन ही अच्छा
लगता है.
यह कथन
केवल बालकृष्ण की भोजन-रुचि का वर्णन नहीं है, बल्कि उनकी प्रसिद्ध माखन-लीलाओं की भूमिका भी है.
ब्रज में कृष्ण की पहचान ही "माखन-चोर" के रूप में बन गई थी. वे घर-घर
जाकर गोपियों के यहाँ माखन चुराकर खाते थे और इसी बहाने भक्तों के प्रेम को
स्वीकार करते थे.
ब्रज-जुवती
इक पाछै ठाढ़ी, सुनत श्याम की बात.
मन-मन कहति कबहुं अपनैं घर, देखौं माखन खात.
इसी समय एक ब्रज
युवती (गोपी) यशोदा के पीछे खड़ी होकर कृष्ण की बातें सुन रही होती है. जब वह
कृष्ण को माखन के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हुए सुनती है, तो उसके मन में एक मधुर
इच्छा जाग उठती है. वह मन-ही-मन सोचती है कि कितना अच्छा हो यदि कृष्ण कभी उसके घर
भी माखन खाने आएँ.
बैठे जाइ
मथनियाँ कैं ढिग, मैं 'तब रहौं छपानी.
सूरदास प्रभु अंतरजामीं ग्वालिनि मन की जानी.
गोपी कल्पना
करती है कि कृष्ण उसके घर में दही मथने के स्थान के पास बैठकर माखन खा रहे हों और
वह स्वयं कहीं छिपकर उस मनोहर दृश्य का आनंद ले रही हो. यहाँ गोपी की इच्छा केवल
कृष्ण को माखन खिलाने की नहीं है, बल्कि उनके दिव्य रूप और बाल-लीला का दर्शन करने की है. उसके लिए कृष्ण का
माखन खाना भी एक आध्यात्मिक उत्सव बन जाता है.
इस
प्रसंग में गोपी की भावना अत्यंत सूक्ष्म और भक्तिपूर्ण है. वह कृष्ण को पकड़ना या
रोकना नहीं चाहती, बल्कि छिपकर उनकी बाल-लीला का रसास्वादन करना चाहती है. यह भक्त की उस
अवस्था का प्रतीक है जहाँ वह भगवान की प्रत्येक लीला में आनंद अनुभव करता है.
अंत में
सूरदास कहते हैं कि भगवान कृष्ण अंतर्यामी हैं. वे अपने भक्तों के मन की प्रत्येक
भावना और इच्छा को जानते हैं. इसलिए वे तुरंत ही उस गोपी के मन की कामना को समझ
लेते हैं. भगवान को अपने भक्तों के हृदय की बात बताने की आवश्यकता नहीं होती. वे
बिना कहे ही सब जान लेते हैं.
यहाँ कवि
भगवान की भक्तवत्सलता को प्रकट करते हैं. कृष्ण केवल गोपी के घर माखन खाने नहीं
जाते, बल्कि उसके प्रेम और
भक्ति को स्वीकार करने जाते हैं. इस प्रकार भगवान और भक्त के मधुर संबंध का अत्यंत
सुंदर चित्रण इस पद में मिलता है.
विशेषताएँ
1. कृष्ण की माखन-प्रियता का मनोरम चित्रण, गोपी
के भक्तिभाव और प्रेम का सुंदर निरूपण और भगवान की अंतर्यामी सत्ता का वर्णन के
साथ – साथ भक्त और भगवान के मधुर संबंध की अभिव्यक्ति का सफल वर्णन किया है.
2. कृष्ण और यशोदा के संवाद में वात्सल्य रस
की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है.
3. गोपी की मनोकामना और कृष्ण की माखन-लीला
माधुर्य भाव से ओत-प्रोत है.
4. पूरे पद में भक्त और भगवान के प्रेममय
संबंध की अनुभूति होती है.
5. गोपी की इच्छा निस्वार्थ प्रेम और समर्पण
का प्रतीक है.
6. भगवान भक्तों के हृदय की प्रत्येक भावना
को जानते हैं.
7. सच्चे प्रेम और भक्ति को भगवान स्वयं
स्वीकार करते हैं.
8. बाहरी वैभव (मेवा-पकवान) की अपेक्षा प्रेम
का माखन भगवान को अधिक प्रिय है.
9. माखन यहाँ भक्त के निर्मल और प्रेमपूर्ण
हृदय का प्रतीक माना जा सकता है.
10. "मन-मन",
"माखन खात" आदि में ध्वनि-सौंदर्य दृष्टिगत होता है. अनुप्रास
अलंकार है.
11. "मन-मन" में
पुनरुक्ति द्वारा भाव की गहराई व्यक्त हुई है. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है.
12. माखन
को भक्त के निर्मल प्रेम और हृदय की मधुरता का प्रतीक माना जा सकता है. यह रूपकात्मक
संकेत है.
13. ब्रजभाषा
का मधुर एवं सरस संवादात्मक शैली, सहज, सरल और भावपूर्ण अभिव्यक्ति और लोकजीवन एवं
ब्रज-संस्कृति की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है.
14. यह
पद सूरदास की कृष्ण-लीला वर्णन-कला का उत्कृष्ट उदाहरण है.
15. इस में
वात्सल्य और माधुर्य दोनों भावों का सुंदर समन्वय है.
16. भक्त
और भगवान के संबंध को अत्यंत सहज और मानवीय रूप में प्रस्तुत किया गया है.
17. कृष्ण
की अंतर्यामी और भक्तवत्सल छवि का प्रभावशाली चित्रण मिलता है.
18. प्रस्तुत
पद में सूरदास ने बालकृष्ण की माखन-प्रियता, गोपी के प्रेम पूर्ण भक्ति भाव तथा भगवान की
अंतर्यामी शक्ति का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है. कृष्ण का मेवा-पकवानों को
छोड़कर केवल माखन को प्रिय बताना उनकी बाल-लीला की सहजता को व्यक्त करता है,
जबकि गोपी की इच्छा उनके प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति का परिचायक है.
अंत में भगवान द्वारा भक्त के मन की बात जान लेना उनकी भक्तवत्सलता और सर्वज्ञता
को प्रकट करता है. इस प्रकार यह पद वात्सल्य, माधुर्य और
भक्ति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है तथा सूरदास की काव्य-प्रतिभा का श्रेष्ठ
उदाहरण कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है.
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