Sursagar, Gokul leela 99, खेलन दूरि जात कत कान्हा । आजु सुन्यौ मैं हाऊ आयौ, तुम नहिं जानत नान्हा। सूरदास

 

Sursagar, Gokul leela 99, 

खेलन दूरि जात कत कान्हा । आजु सुन्यौ मैं हाऊ आयौ, तुम नहिं जानत नान्हा। सूरदास.

आचार्य एस. वी. एस. एस. नारायण राजू

प्रसंग

भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद बालकृष्ण की बाल-लीलाओं और माता यशोदा के वात्सल्य-भाव का अत्यंत स्वाभाविक चित्रण करता है. बालकृष्ण अपने सखाओं के साथ दूर वन में खेलने जाना चाहते हैं, परंतु माता यशोदा उनके प्रति अत्यधिक स्नेह और चिंता के कारण उन्हें दूर जाने से रोकना चाहती हैं. इसलिए वे बालकों को डराने के लिए "हाऊ" (हौवा या काल्पनिक डरावना प्राणी) की कहानी सुनाती हैं. इस पद में मातृत्व की सुरक्षा-भावना, बालकों की सरलता तथा पारिवारिक स्नेह का अत्यंत सुंदर चित्रण कवि सूरदास जी ने किस प्रकार किया है, अब सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे.

पद

खेलन दूरि जात कत कान्हा ।
आजु सुन्यौ मैं हाऊ आयौ, तुम नहिं जानत नान्हा ।
इक लरिका अबहिं भजि आयौ, रोवत देख्यौ ताहि ।
कान तोरि वह लेत सबनि के, लरिका जानत जाहि ।
चलौ न, बेगि सबारै जैये, भाजि आपनैं धाम ।
सूर स्याम यह बात सुनतही बोलि लिए बलराम ।99

शब्दार्थ

खेलन  -  खेलने

दूरि  -  दूर

कत  -  क्यों

कान्हा  -  कृष्ण

सुन्यौ  -  सुना

हाऊ  -  हौवा, डरावना काल्पनिक प्राणी

नान्हा  -  छोटा बालक

लरिका  - लड़का

भजि आयौ  -  भागकर आया

ताहि  -  उसे

सबनि के  -  सब के

जानत  - पहचानता

जाहि  -  जिसे

बेगि  -  शीघ्र

सबारै  -  सब लोग

धाम  -  घर

बोलि लिए  -  बुला लिया

व्याख्या

खेलन दूरि जात कत कान्हा.
आजु सुन्यौ मैं हाऊ आयौ, तुम नहिं जानत नान्हा.
इस पद में सूरदास ने माता यशोदा की ममता और बालकों की सरल मानसिकता का अत्यंत मनोरम चित्रण किया है. बालकृष्ण अपने मित्रों के साथ दूर वन में खेलने जाना चाहते हैं. माता यशोदा को यह बात पसंद नहीं आती, क्योंकि वे अपने छोटे से पुत्र को अपनी आँखों से दूर नहीं होने देना चाहतीं. उन्हें भय है कि कहीं खेलते-खेलते कृष्ण किसी संकट में न पड़ जाएँ. इसलिए वे उन्हें रोकने के लिए एक युक्ति का सहारा लेती हैं.

यशोदा प्रेमपूर्वक कृष्ण से कहती हैं—"हे कान्हा! तुम दूर वन में खेलने क्यों जाते हो? तुम अभी बहुत छोटे हो, इसलिए संसार की बातों को नहीं जानते. आज मैंने सुना है कि जंगल में एक भयानक 'हाऊ' आ गया है."

यहाँ "हाऊ" किसी वास्तविक प्राणी का नाम नहीं है, बल्कि बच्चों को डराकर सुरक्षित रखने के लिए लोकजीवन में प्रयुक्त एक काल्पनिक पात्र है. भारतीय परिवारों में छोटे बच्चों को कभी-कभी किसी काल्पनिक भय का उल्लेख करके अनुचित कार्यों से रोका जाता है. सूरदास ने इसी लोक-मनोविज्ञान को अत्यंत स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया है.

इक लरिका अबहिं भजि आयौ, रोवत देख्यौ ताहि.
कान तोरि वह लेत सबनि के, लरिका जानत जाहि.
यशोदा अपनी बात को और विश्वसनीय बनाने के लिए कहती हैं कि अभी-अभी एक लड़का जंगल से भागकर आया है और मैंने उसे रोते हुए देखा है. वह बहुत डरा हुआ था. इससे बालकों के मन में उस "हाऊ" का भय और अधिक बढ़ जाता है.

इसके बाद यशोदा कहती हैं कि वह हाऊ जिस भी छोटे बच्चे को देखता है, उसके कान तोड़ लेता है. यह सुनकर बालकों के मन में भय उत्पन्न हो जाता है. यहाँ कवि ने बच्चों की सहज विश्वासशीलता का सुंदर चित्रण किया है. छोटे बच्चे अपने बड़ों की बातों को बिना किसी तर्क के सत्य मान लेते हैं.

चलौ न, बेगि सबारै जैये, भाजि आपनैं धाम.
सूर स्याम यह बात सुनतही बोलि लिए बलराम.

यशोदा की यह बात सुनकर अन्य ग्वाल बालक भी घबरा जाते हैं. वे आपस में कहने लगते हैं कि आज जल्दी-जल्दी अपने घर लौट चलना चाहिए. कहीं वह हाऊ हमें भी न पकड़ ले. उनकी यह प्रतिक्रिया बाल-सुलभ भय और सरलता को प्रकट करती है.

सूरदास कहते हैं कि जैसे ही बलराम ने यह बात सुनी, उन्होंने तुरंत कृष्ण को अपने पास बुला लिया. बड़े भाई होने के नाते बलराम के मन में भी कृष्ण के प्रति स्नेह और संरक्षण की भावना है. वे चाहते हैं कि कृष्ण किसी प्रकार के खतरे में न पड़ें. इस प्रकार इस छोटे से प्रसंग में मातृ-स्नेह, भ्रातृ-प्रेम और बाल-मनोविज्ञान का सुंदर समन्वय दिखाई देता है.

गहरे स्तर पर यह पद यह भी दर्शाता है कि माता-पिता अपनी संतान की सुरक्षा के लिए कभी-कभी ऐसे उपाय अपनाते हैं जो बालकों को तत्काल समझ में आ जाएँ. यशोदा का उद्देश्य कृष्ण को डराना नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करना है. यही मातृत्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है.

विशेषताएँ

1.  माता यशोदा की ममता और संरक्षण-भावना का चित्रण, बालकृष्ण और ग्वाल बालकों की सरलता का स्वाभाविक वर्णन और लोकजीवन में प्रचलित "हाऊ" की अवधारणा का प्रयोग के साथ-साथ बलराम के भ्रातृ-स्नेह का सुंदर वर्णन किया है.

2.   इस पद में वात्सल्य रस की प्रधानता है. यशोदा की प्रत्येक बात अपने पुत्र की सुरक्षा की चिंता से प्रेरित है.

3.  "हाऊ" की काल्पनिक कथा तथा बालकों का उससे डर जाना हल्का हास्य उत्पन्न करता है.

4.  बालकों के मन में उत्पन्न भय का स्वाभाविक चित्रण हुआ है.

5.  बलराम का कृष्ण को अपने पास बुलाना भ्रातृ-स्नेह को व्यक्त करता है.

6.  बच्चों का आसानी से डर जाना,  बड़ों की बातों पर तुरंत विश्वास कर लेना, माता का बच्चे की सुरक्षा के लिए युक्तियाँ अपनाना, बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति संरक्षण-भाव आदि  बाल-मनोविज्ञान और मातृत्व-मनोविज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है.

7.  "चलौ चल" में ध्वनि की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार है.

8.  "चलौ चल" में पुनरुक्ति के माध्यम से भाव की तीव्रता व्यक्त हुई है. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है.

9.  "कान तोरि वह लेत सबनि के" में हाऊ के भय को बढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है. अतिशयोक्ति अलंकार है.

10. ब्रजभाषा का सरल एवं मधुर रूप, लोकजीवन से जुड़े शब्दों और प्रसंगों का प्रयोग के साथ-साथ सहज, स्वाभाविक संवादात्मक शैली को अत्यंत प्रभावपूर्ण रुप से किया है.

11. बाल-मनोविज्ञान के चित्रण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पद है.

12. सूरदास की वात्सल्य-वर्णन कला का सुंदर उदाहरण कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है.

13. ब्रज संस्कृति और लोकजीवन का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया है.

14. कृष्ण की बाल-लीलाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों की मधुरता का सफल प्रस्तुतीकरण किया है.

15. प्रस्तुत पद में सूरदास ने माता यशोदा के वात्सल्यपूर्ण हृदय और बालकों की सरल मानसिकता का अत्यंत स्वाभाविक चित्रण किया है. यशोदा अपने प्रिय पुत्र कृष्ण को दूर जाने से रोकने के लिए "हाऊ" की काल्पनिक कथा सुनाती हैं. बालकों का उस कथा पर विश्वास करना, भयभीत हो जाना और बलराम का कृष्ण को अपने पास बुला लेना इस पद को अत्यंत जीवंत और मनोवैज्ञानिक रूप से प्रामाणिक बनाता है. यह पद केवल कृष्ण की बाल-लीला का वर्णन नहीं करता, बल्कि मातृत्व, संरक्षण, प्रेम और बाल-स्वभाव के शाश्वत सत्य को भी अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करता है.


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