हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श : पहचान , संघर्ष और सांस्कृतिक संदर्भ आचार्य एस.वी.एस.एस.नारायण राजू 21वीं सदी को हिंदी कथा साहित्य में किन्नर विमर्श, डॉ. मिलन बिष्नोई. प्रकाशन वर्ष 2025, ISBN No. 978-93-48200-09-9 भारतीय समाज में किन्नर समुदाय का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों , पुराणों और महाकाव्यों तक मिलता है. महाभारत में शिखंडी का चरित्र हो या रामायण में श्रीराम के अयोध्या लौटने पर किन्नरों का स्वागत – यह समुदाय सांस्कृतिक इतिहास में सदैव मौजूद रहा है. किंतु आधुनिक समय तक आते-आते किन्नरों की छवि केवल हाशिए पर खड़े , उपेक्षित और उपहास का पात्र बने समूह की तरह गढ़ दी गई. साहित्य में किन्नर विमर्श का उदय इस ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक असमानता के प्रतिकार के रूप में देखा जा सकता है. यह विमर्श उनकी उपस्थिति को समाज के केंद्र में लाकर उन्हें ' वस्तु ' या ' हास्य ' नहीं बल्कि मानव के रूप में चित्रित करता है. पिछले दो दशकों में हिंदी कथा-साहित्य और उपन्यासों में किन्नर जीवन के विविध आयाम सामने आए हैं. जैसे - कथाकारों के उपन्यास और कहानियाँ किन्नरों की आंतरिक पीड़ा ,...
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