मेरी ग़रीबी महान





मेरी ग़रीबी महान

प्रो. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू

दक्षिण समाचार, 13 माई,1998


 नेता गण आते हैं।
सभा में नारा लगाते हैं।
 मेरा भारत महान
हम ही सच्चे राष्ट्र-रक्षक।
विपक्ष पर करते हैं प्रहार।
देते हैं अनगिनत वर।
दिखाते हैं हाथ में ही स्वर्ग।
लेते हैं मत।
 चलते हैं दिल्ली।
शुरु होता है
कुर्सी के लिए दाव-पेंच,
उल्टे हो जाते हैं मित्र-शत्रु।
लेकिन
चलता है निरंतर भ्रष्टाचार।
बढ़ता जाता है काला-बाजार।
सबको अन्न खिलाकर,
किसान खा रहे हैं ज़हर।
कहते हैं हम सब समान।
करते हैं सब को अलग-अलग,
राज्य, धर्म, जाति के नाम पर।
 लोग भी बनते हैं अनुगामी,
अंध, मूक,, बधिर जैसे,
चलाते हैं आंदोलन,
नाश करते हैं राष्ट्र-संपत्ति
मगर
भूल रहे हैं
हमें तो नाश करना है,
काला-बाजार, भ्रष्टाचार तथा गुंडागर्दी को,
फेंकना है मूल से गरीबी को,
 यह काम न करने से
कहना पड़ता है बाद में,
मेरा भारत महान नहीं
मेरी गरीबी महान।

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