पंकज सुबीर कृत “अकाल में उत्सव” में चित्रित कृषक जीवन और कॉर्पोरेट जगत का यथार्थ
पंकज सुबीर कृत “अकाल में उत्सव” में चित्रित कृषक जीवन और कॉर्पोरेट जगत का यथार्थ
Heritage Research Journal
HERITAGE RESEARCH JOURNAL
UGC Care Group 1 Journal | ISSN: 0474-9030
Volume 72 – Issue 7 – 2024
पंकज सुबीर कृत “अकाल में उत्सव” में चित्रित कृषक जीवन और कॉर्पोरेट जगत का यथार्थ
आचार्य. एस.वी.एस.एस.नारायण राजू
Page No: 198 – 205
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भारत एक विभिन्न संस्कृतियों वाला देश है. इस देश में समय-समय पर सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक विविधता को भिन्न-भिन्न स्वरूपों में देखा जा सकता है. ‘संस्कृति’ किसी भी देश की पहचान होती है. कृषि संस्कृति भारत देश की प्राचीन संस्कृति होने के साथ-साथ भारत की पहचान भी है. कोई भी देश तब ही सबल और सम्पन्न होता है जब उस देश की पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत से हो. भारत की पहचान कृषि संस्कृति वाले देश के रूप में होती है. कोई भी देश आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक समृध्दि के आधार पर ही विश्व में अपने अस्तित्व को प्रकट कर सकता है लेकिन यदि किसी देश की अपनी कोई सांस्कृतिक विशेषता नहीं है तो उसकी पहचान को खतरा रहता है. भारत मुख्यतः कृषि प्रधान देश है. यहाँ की लगभग 70 प्रतिशत जनता गाँवों में निवास करती है जिसके कारण भारत को गाँवों का देश कहलाने का गौरव प्राप्त है. भारतीय आबादी का अधिकतम भाग गाँवों में रहने के कारण भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है.
किसान भारतीय समाज की न केवल एक श्रमशील इकाई है, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक, आर्थिक और वैचारिक धारा का स्रोत भी है. भारतीय किसान धूप-वर्षा को सह कर समस्त मानव मात्र का पेट भरता है. हसिया, खुरपी, कुदाल, फावड़ा, हल, बैल आदि किसान के अंग हैं, इनके बिना उसका जीवन व्यर्थ है. आज तकनीकि सुविधाओं के चलते किसान को जहाँ एक तरफ सहूलियत हुई है तो दूसरी ओर उससे उसका अस्तित्व भी खतरे में आ गया है. हल-बैल खत्म हो जा रहे हैं. ट्रैक्टर ने हजारों मजदूरों का रोजगार छीन लिया है. किसान भारत की रीढ़ की हड्डी के समान हैं. इस रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा और इसको सहूलियत देने के लिए हर संभव प्रयास करना अपेक्षित है. किसान रोज तमाम चिंताओं को दफन करके सो पाता है. यह भारतीय किसान की बड़ी महानता ही है कि वह अत्यंत परिश्रमी और संघर्षरत है. भारत गाँवों का देश है और भारत की आत्मा गाँवों में विचरती है. भारत की प्राचीन और शुद्ध संस्कृति का निखरा रूप केवल गाँवों में ही देखा जा सकता है. गाँव में यदा-कदा ही कोई नौकरी-पेशा वाला व्यक्ति होता है अन्यथा सब ग्रामीण लगभग कृषि के कार्य में ही लगे होते हैं वही उनका रोजगार होता है और जीवन यापन करने का मुख्य स्रोत होता है.
किसानी जीवन की बात करते समय केवल उनके सामाजिक और आर्थिक पहलुओं पर ही बात नहीं करनी है बल्कि व्यावहारिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और वैचारिक पहलुओं को भी केंद्र में लाना है. भारत के स्वतंत्र होने से पहले से ही हिंदी साहित्य में किसानी जीवन पर साहित्य लिखने का सिलसिला रहा है. प्रेमचंद इस सिलसिले के गवाह हैं. प्रेमचंद ने ग्रामीण जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपनी लेखनी चलाई इसी कारण उनका साहित्य संपूर्णता को प्राप्त कर गया. उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, स्त्री, गरीब, अमीर आदि ग्रामीण पहलुओं को छुआ.
हिंदी उपन्यास में किसानी जीवन की परंपरा को ध्यान में रखते हुए मैनेजर पाण्डेय अपनी पुस्तक ‘साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि’ में लिखते हैं –“भारतीय उपन्यास का स्वतंत्र रूप तब विकसित हुआ जब उपन्यास रचना के केंद्र में भारतीय किसान-जीवन आया, तभी वह यथार्थवाद विकसित हुआ जो राष्ट्रीय जागरण का अभिन्न अंग था. किसान जीवन से जुड़कर ही भारतीय उपन्यास की सच्ची भारतीयता विकसित हुई और उपन्यास राष्ट्रीय जीवन की महागाथा का प्रतिनिध साहित्य रूप बना. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है. किसान भारतीय समाज का मेरुदंड पहले भी था और आज भी है.”(1) हिंदी साहित्य में किसानी परंपरा के शुरुआती दौर में प्रेमचंद ही वह व्यक्ति रहे जिन्होंने किसान जीवन को बारीकी से देखा और समझा फिर अपने साहित्य के माध्यम से जनता तक पहुँचाया. अतः प्रेमचंद के बिना कथा-साहित्य खासकर वह कथा-साहित्य जिसमें ग्रामीण जीवन का दस्तावेज़ हो, ऐसे साहित्य की कल्पना करना संभव नहीं है.
भारत में किसानों के सामने अनेकों समस्याएँ हैं. प्राकृतिक आपदा से लेकर बाजार तक वह समस्याओं से जूझता रहता है. कभी फसल के उचित मूल्य न मिलने की समस्या, कभी संसाधनों का अभाव, कभी महंगे और नकली बीज की समस्या तो कभी पानी और खाद की समस्या बनी ही रहती है. किसान जीवनपर्यंत समस्याओं से जूझता रहता है. पूंजीवाद, सरकारें, कॉर्पोरेट जगत, व्यापारी आदि सब अपना हिस्सा किसान के उत्पादन से ही लेते हैं. लेकिन इनमें किसी को फुरसत नहीं है कि किसानी समस्याओं से रूबरू हों. पूंजीवाद की गिद्ध दृष्टि और किसान जीवन को देखते हुए सच्चिदानंद सिन्हा अपनी पुस्तक ‘भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ’ में लिखते हैं कि-“अपनी हित रक्षा में अपने चरित्र के कारण पूंजीवाद कहीं भी अनियोजित विकास ही करता है. इससे क्षेत्रीय विषमताएं उभरती हैं और जहाँ भी इसका पैर पड़ता है वहाँ संपन्नता और विपन्नता में अंचलों और समूहों का विभाजन होता है. इससे हर जगह आंचलिक या समूहों के बीच संघर्ष उभरते हैं. छोटी खेती और किसानों का अस्तित्व समाप्त होने लगता है और विशाल पैमाने पर बेरोजगारी फैलती है.”(2) पूंजीवाद सबकुछ अपने हाथ में लेते जा रहा है. जिसके कारण किसान, मजदूर, छोटे विक्रेता आदि गर्त में जा रहे हैं. आज पूंजीवाद की गिरफ्त में सब कोई है अगर कोई थोड़ा अलग था तो वह सिर्फ किसान था लेकिन आज वह भी कॉर्पोरेट के अधीन होता जा रहा है.
किसान भारतीय संस्कृति के स्तंभों में से एक हैं. आज विकास के नाम पर किसान जीवन व कृषि संस्कृति को बेचा जा रहा है. 1991-92 से भारत में उदारवादी व्यवस्था की शुरुआत हुई है. इस व्यवस्था में ‘उदार’ होने के जैसा कुछ भी नहीं है. प्रश्न उठता है कि उदारवादी व्यवस्था आखिरकार किसके प्रति उदार है ? हालांकि इस व्यवस्था में पूँजीपतियों का ही वर्चस्व दिखाई देता है. आज कॉर्पोरेट जगत में किसान महज एक मजदूर बन गया है. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किसानों की भूमि पर गिद्ध दृष्टि लगाए हैं. विकास के नाम पर निम्नस्तरीय किसान कॉर्पोरेट व्यवस्था की बलि चढ़ रहे हैं. यह मल्टीनेशनल कंपनियाँ ऐसे जगह पर स्थापित हो रही हैं जहाँ से वह आसानी से व्यापार मार्ग का उपयोग कर सकें. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ यह जान चुकी हैं कि तीसरी दुनिया अर्थात किसानी जीवन व कृषि पर कब्जा कर लेने से एक बड़े बाजार की शुरुआत हो जाएगी.
आज साहित्य भी कॉर्पोरेट जगत से अछूता नहीं रहा है. आधुनिक उपन्यासों में भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, पूँजीपतियों आदि के असली चरित्र को दिखाया गया है. ‘फाँस’ उपन्यास में लेखक कॉर्पोरेट जगत की सच्चाई बताते हुए लिखता है कि-“ये फिल्म वाले, ये धरम वाले, ये कॉर्पोरेट वाले, ये विल्डर्स और दूसरे पैसे वाले सेठ देश की सारी लाभ देने वाली जमीन खरीद ही चुके हैं. आने वाले दिनों में खेती भी कॉर्पोरेट घराने वाले करेंगे, किसान का नाम ही मिट जाएगा. ओले शायद हमें बख्स दें, टिड्डियाँ हमें बख्स दें मगर ये टिड्डियों से भी खतरनाक हैं. ये लोग कुछ भी नहीं छोडते.”(3) किसान का अस्तित्व आज खतरे में है. यदि समय से ध्यान न दिया गया तो जल्दी ही किसान नाम की संज्ञा मिट जाएगी. कॉर्पोरेट जगत किसान को उनके ही खेत में मजदूर बनने पर विवश कर देगा. लेखक ने सही कहा है प्राकृतिक आपदाओं से कहीं अधिक विनाशकारी है यह कॉर्पोरेट जगत. कॉर्पोरेट संस्कृति या मल्टीनेशनल कंपनियाँ सिर्फ इतना ख्याल रखती हैं कि उनके ग्राहक जिंदा रहें. इनका उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक लाभ कमाना होता है.
देश में स्वतंत्रता के पश्चात भुखमरी के प्रश्न ने मल्टीनेशनल कंपनियों को पनाह दी कि किसी प्रकार से भारतीय जनमानस की क्षुधा को तृप्त किया जाए. इस उदर पूर्ति की समस्या का निवारण करने के लिए भारत ने ‘विश्व व्यापार संगठन’ से अनुबंध किया. डॉ. कृष्णस्वरूप आनंदी, भारत और ‘विश्व व्यापार संगठन’ के मध्य हुए समझौते पर लिखते है कि- “विश्व व्यापार संगठन ने जो ‘कृषि पर समझौता’ तैयार किया है उसके पीछे अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘कारगिल’ का शातिर दिमाग है. उसके पूर्व उपाध्यक्ष डॉन एम्स्टुज ने समझौते का प्रारूप लिखा था. बहुराष्ट्रीय देशी-विदेशी औद्योगिक या कारोबारी घरानों व समूहों का सपना है ‘किसानों द्वारा खेती’ के स्थान पर ‘कॉर्पोरेट फ़ार्मिंग’ हो वे यह तय करना चाहते हैं कि कहाँ-कहाँ किन-किन खाद्यान्नों और भोज्य पदार्थों का उत्पादन हो और इसके साथ खाद्य पदार्थों के उत्पादन, वितरण, कारोबार या व्यापार पर कॉर्पोरेट माफिया का पूर्ण नियंत्रण हो. आखिर अमेरिका में यही तो हुआ.”(4) भारत में कॉर्पोरेट जगत ने हर क्षेत्र में अपना कब्जा जमा लिया है. लोगों को क्या खाना है, क्या पहनना है, कहाँ जाना है और क्या करना है यह सब कॉर्पोरेट तय कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यदि सहायता के लिए आगे आ रही हैं तो वह पहले अपना हित देख रहीं हैं. यह सत्य ही है कि कॉर्पोरेट जगत का सपना है कि किसान का अस्तित्व समाप्त हो और वह महज एक मजदूर बन कर कॉर्पोरेट खेती में काम करें.
कॉर्पोरेट का कृषि में हस्तक्षेप करने में सरकार का भी बड़ा अहम योगदान है. कृषि में पूंजीवाद का प्रवेश कृषि संस्कृति को समाप्त करने का षड्यंत्र है. सरकारें किस प्रकार से किसानों को कॉर्पोरेट के अधीन खेती (ठेका खेती) करने को बाध्य कर रही हैं इसका चित्रण पंकज सुबीर अपने उपन्यास ‘अकाल में उत्सव’ में इस प्रकार से करते हैं-“ऐसा लगता है जैसे सरकारें खुद ही किसानों को खेती करने से रोकना चाह रही हैं, मल्टीनेशनल के इशारों पर. कभी यूरिया का संकट, कभी बिजली का संकट, कभी बीज का संकट, सारे संकट किसान के सामने ही क्यों पैदा किए जा रहे हैं ? ताकि वह घबरा कर अपने खेत बेच दे मल्टीनेशनल्स को. यह बहुत बड़ा षड्यंत्र है, बड़ी कांसपिरेंसी है. यह समस्याएँ प्राकृतिक नहीं हैं, यह तो पैदा की जा रही हैं किसानों के सामने.”(5) आज इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने किसानों के सामने संकट परोस दिया है. बिजली, पानी, खाद, बीज, साधन आदि सब इतने महंगे हो गए हैं कि एक आम किसान इन कृषि साधनों पर अधिक व्यय नहीं कर सकता है. लेखक इशारा करता है भविष्य में खेती मल्टीनेशनल्स कंपनियाँ करेंगी और किसान और उसके बच्चे कंपनियों के खेतो में मजदूरी करेंगे.
मल्टीनेशनल्स कंपनियाँ भविष्य में कितनी हानिकारक सिद्ध हो सकती इसका इशारा ‘अकाल में उत्सव’ उपन्यास में मिलता है जिसमें रमेश चौरसिया ए. डी. एम. राकेश पांडे से कहता है-“मल्टीनेशनल्स कंपनियाँ सारे काम अपनी शर्तों पर करती हैं. उनके लिए न तो खाद की कमी होने वाली है, न बीज की और न बिजली की. सब तो यह लोग ही बना रहे हैं. आप जितने हल्के में बात को ले रहे हैं, बात उतनी छोटी है नहीं. आप उस दिन की भयावहता नहीं समझ पा रहे हैं, जब किसान नाम की प्रजाति हमारे देश से खत्म हो जाएगी और खेती का सारा काम मल्टीनेशनल करेंगी. हमने बहुत भयानक खेल की शुरुआत कर दी है सर.”(6) किसान के लिए कृषि सुविधाएं इसलिए सहज उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं क्योंकि यदि सुविधाएं सहज मिलने लगीं तो क्यों किसान कॉर्पोरेट और कंपनियों को पूछेगा ? इसमें कोई अंदेशा नहीं है कि किसान आज हाशिए पर खड़ा है और उसका अस्तित्व खतरे में है.
किसी भी समाज का वजूद उस समाज में प्रचलित व्यवस्थाओं से होता है. ऐसे ही किसानी संस्कृति और किसान का वजूद कृषि के होने से है. यदि दोनों में से एक का अस्तित्व समाप्त होगा दूसरा स्वतः समाप्त हो जाएगा. आज जिस प्रकार से ‘ठेके पर खेती’ करने का प्रचलन हो रहा है उसको देख कर लगता है किसान और कृषि संस्कृति को ध्वस्त होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने लाभ को ध्यान में रखकर किसानों को फसल उगाने को विवश करेंगी. ठेका खेती में ठेकेदार को किसान के खेत की चिंता कतई नहीं होगी कि उसके खेत की मिट्टी में उर्वरा शक्ति बची है या नहीं, ठेकेदार के लिए यह लाभकारी होगा कि अब कौन सी फसल लगाई जाए जिससे अधिक से अधिक लाभ हो सके.
मल्टीनेशनल कंपनियाँ अपना पैर ग्रामीण इलाकों में पसार रही हैं. वह ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर युवाओं को कृषि योग्य जमीन बेचने के लिए गुमराह कर रही हैं. नौकरी का लालच देकर किसान को उसकी जमीन से दूर कर देना इन कंपनियों का लक्ष्य है. यह कंपनियाँ जमीन को गिरफ्त में लेने के लिए युवाओं को सुविधाओं का लालच देती हैं. सुनील चतुर्वेदी के ‘कालीचाट’ उपन्यास में दिखाया गया है कि किस प्रकार से कंपनियाँ युवाओं को भ्रमित कर रही हैं. कंपनी मैनेजर अंबानाथ लड़को को भ्रमित करता है वह कहता है-“खेती किसानी के काम में अब दम नहीं है. मेरे खुद के पास दस एकड़ जमीन थी तब फटीचर जैसा घूमता रहता था. अब देखो कैसे ठाठ हैं मेरे. ऐसे ठाठ तुम्हारे गाँव में कोई के हैं ? अपनी कलाई लड़कों के सामने लहराता है, “यह घड़ी देखो...पूरे आठ हजार की है.” टेबल पर रखा चश्मा हाथ में उठाकर दिखाता, “यह चश्मा तीन हजार का है” कुर्सी के खड़े होकर तर्जनी उँगली से जूतों की तरफ इशारा करता है, जूते... एडीडास कंपनी के हैं. दुनियाँ की एक नंबर कंपनी है.”(7)
कॉर्पोरेट जगत ने खेती के मूल्यों में भारी बढ़ोत्तरी की है जिसके चलते किसान को लगने लगा है कि वह खेती बेचकर पैसे का अन्य जगह पर निवेश कर जीवन यापन कर सकता है. किसान कंपनियों को जमीन बेचकर उसी जमीन पर ठेके पर खेती करता है. ठेके पर कृषि में सारी की सारी जवाबदेही किसान की होती है कि किसान एक निश्चित समय में, निश्चित मूल्य पर, गुणवत्ता युक्त उत्पाद कंपनी को देगा. यदि इस उत्पाद में किसी कारण वश एक निश्चित गुणवत्ता न आई तो कंपनी किसान से वह उत्पाद खरीदने के बाध्य नहीं होंगी. इस स्थिति में सारा घाटा किसान को ही होगा, कंपनी इस घाटे की भरपाई के लिए जिम्मेदार नहीं होगी. कॉर्पोरेट खेती में किसान को सतर्क और जुझारू बने रहना पड़ता है. साथ ही इस ठेका खेती में श्रम गौण तथा उत्पाद अथवा पूँजी विशेष होती है. मध्यवर्गीय किसान के पास पूँजी का भंडार नहीं होता है बल्कि श्रम ही उसकी पूँजी होती है.
ग्रामीण युवा शीघ्र ही चकाचौंध की तरफ आकर्षित हो जाते हैं. अभावों से भरी ज़िंदगी व्यक्ति को क्षणिक सुखों के प्रति अनायास खींचती है. ऐसा ही कुछ इन युवाओं का हाल है जो अंबानाथ के पास बैठकर खेती बेचने के बारे में सोचने लगते हैं-“सुरेश ने फिर से हिम्मत करके जमीन बेचने की बात उठाई तो रेशमी भड़क गई, जमीन बेचने की बात दुबारा मत करजे । जमीन बेचना तो पेलां म्हारे जहर दे दीजे.”(8) आज की युवा पीढ़ी खेती किसानी से दूर होकर शहरी जीवन की अभ्यस्त हो रही है, शहर जहाँ चकाचौंध तो है लेकिन मानसिक सुकून नहीं है. गाँव में रहकर व्यक्ति अपना गुजारा कर सकता है लेकिन शहर में जब तक हाथ में धन है तब तक ही ठहर सकते हैं. इसीलिए रेशमी सुरेश पर गुस्सा करती है. वह जानती है कि आज अगर जमीन बेच दी तो दो वक्त की रोटी मिलना कठिन हो जाएगा.
अंततः कह सकते हैं कि आज का किसान सफल किसान नहीं रहा है, उसे अस्तित्वहीन करने में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बड़ा हाथ है. वर्तमान समय में मेहनत करने वाले वर्ग का अस्तित्व संकट में हैं. एक तरफ किसान से उसकी ही जमीन हथियाई जा रही है दूसरी तरफ किसान को उसके ही खेत में मजदूर बनने पर विवश होना पड़ रहा है. तरह – तरह के लोभ देकर उससे उसकी खेती या कहें कि उनकी जीवनचर्या जिसमें वह अपना और अपने परिवार का भरण – पोषण करता है, उससे छीने जाने का षड्यन्त्र चल रहा है. मल्टीनेशनल कंपनियाँ किसान से उसकी जमीन ठेके पर लेकर उसी किसान को फिर जमीन पर मजदूर बना रही हैं. आज किसानी जीवन में वैसे भी अनगिनत समस्याएं हैं जिनसे किसान हर क्षण जूझ रहा है लेकिन फिर भी वह उठ खड़ा होता है और अपने कृषि कर्म को तल्लीनता से करता है. लेकिन यदि समस्याएं यूँ ही बनी रहीं और किसान जीवन की समस्याओं को अनदेखा किया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में किसान अपने ही खेत में मजदूर बन जाएंगे.
संदर्भ :
1. मैनेजर पाण्डेय, साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि, पृष्ठ सं. 306.
2. सच्चिदानंद सिन्हा, भूमंडीलकरण की चुनौतियाँ, पृष्ठ सं. 07.
3. संजीव, फाँस, पृष्ठ सं. 205.
4. अभिनव कदम, अंक 27, दिसंबर 2011-मई 2012, पृष्ठ सं. 242
5. पंकज सुबीर, अकाल में उत्सव, पृष्ठ सं. 175.
6. पंकज सुबीर, अकाल में उत्सव, पृष्ठ सं. 175.
7. सुनील चतुर्वेदी, कालीचाट, पृष्ठ सं. 116.
8. सुनील चतुर्वेदी, कालीचाट, पृष्ठ सं. 118 -119.
संदर्भ ग्रंथ – सूची
1. मैनेजर पाण्डेय साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि, आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड पंचकुला हरियाणा, संस्करण 2016.
2.संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, दरियागंज नई दिल्ली, वर्ष 2015.
3.अभिनव कदम, अंक 27, दिसंबर 2011-मई 2012,
4.पंकज सुबीर, अकाल में उत्सव, शिवना प्रकाशन, सीहोर मध्यप्रदेश, नवाँ संस्करण 2018.
5.सुनील चतुर्वेदी, कालीचाट, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद (उ.प्र.), वर्ष 2015.
6.सच्चिदानंद सिन्हा, भूमंडीलकरण की चुनौतियाँ, वाणी प्रकाशन, दरियागंज नई दिल्ली, वर्ष 2016.