राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के उत्थान में हिंदी पत्र – पत्रिकाओं का अतुलनीय योगदान
राष्ट्रीयता और
भारतीय संस्कृति के उत्थान में हिंदी पत्र – पत्रिकाओं का अतुलनीय योगदान
प्रो.एस.वी.एस.एस.नारायण
राजू.
Sravanthi, January 2023
ISSN 2582-0885
‘हिन्दी
पत्रकारिता राष्ट्रीयता एवं संस्कृति’
किताब के संपादक डॉ. राज कुमार पांडे है । इस पुस्तक में कुल 34 आलेख संकलित हैं ।
संपादकीय कथन को मिलाकर कुल 267 पेज के इस किताब में पत्रकारिता को राष्ट्रीयता
एवं भारतीय संस्कृति के साथ जोड़ कर के अत्यंत शोध परक दृष्टि कोण से लिखा गया है ।
आलेखों के संकलनों से विदित होता है कि
हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता के मध्य का जो अभिन्न संबंध है उसके बारे में एक स्पष्ट विस्तृत दृष्टिकोण मिल जाता है।
भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता (मीडिया) को माना जाता है।
संपादकीय लेखन से भारतीय संस्कृति के साथ
पत्रकारिता के सम्बंध का एक अनोखा उदाहरण देखने को मिलेगा राज कुमार जी ने
पत्रकारिता का प्रारंभ सनातन धर्म के देवऋषी नारद से माना है “ भारतीय सभ्यता
एवं संस्कृति में पहले से ही सूचनाओं का विशेष महत्व रहा है । देवलोक में इस कार्य
का दायित्व देवर्षि नारद के पास है। वे ब्रम्हा के मानस पुत्र कहे गये हैं । उनको
वेदों का संदेश वाहक कहा जाता है । इस आधार पर हम उन्हे वेदों का प्रथम प्रचारक
कहते हैं । वे हाथ में वीणा धरण करते हैं, जिसके आविष्कर्ता वे स्वयं हैं । नारद
द्रुत गति से सूचनाओं को प्रेषित करते हैं । यह लोक कल्याणकारी होने के साथ ही
सत्य एवं प्रामाणिक होती हैं । आज के समय में राष्ट्रीयता एवं संस्कृति एक ज्वलंत
मुद्दा है नारद जी द्वारा प्रेषित सूचनाएं
अधिकांशतः शिष्ट मनोरंजन युक्त होती हैं । उनकी ये सारी विशेषताएं उन्हें आदर्श
पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित कराने के लिए पर्याप्त हैं । वास्तव में नारद
ब्रम्हांड के प्रथम पत्रकार हैं ।” संपादक नारद के पत्रकारिता का उदाहरण देते
हुए स्पष्ट करते हैं कि पत्रकारिता में लोक कल्याण और देशहित की भावनाएँ सर्वोपरि
होना चाहिए ।
भारत की संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’
की संस्कारों से बनी है । यहां की संस्कृति राष्ट्रवाद से ओतप्रोत है, अथर्ववेद
में कहा गया है कि “माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या” यहाँ स्पष्ट है कि यह धरती माता है हम उसके
पुत्र है यह भावना ही राष्ट्रभाव, राष्ट्रीयता व राष्ट्रवाद का सब से बड़ा व उत्तम उदाहरण
है । जब हम राष्ट्रीयता के संबंध में पत्रकारिता के योगदान की बात करें तो
अनेकानेक उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत है । जैसाकि विश्व जगत् इस बात से बखूबी
परिचित है कि भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति में हिंदी पत्रकारिता का योगदान अविस्मरणीय है ।
उसी प्रकार विश्वस्तर पर भारतीय सनातन संस्कृति और भारतीय भाषाओं तथा शिक्षा के
प्रचार-प्रसार करने में भी हिंदी पत्रकारिता ने नैरन्तर्यता के साथ अमूल्य योगदान
दे रही है ।
सर्वविदित है कि भारत
में पत्रकारिता का उद्भव बंगाल से हुआ । हिन्दी में प्रथम पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’
(30 मई 1926 ई) का संपादन पं युगल किशोर शुक्ल ने किया । इस साप्ताहिक पत्र में
संपूर्ण हिंदुस्थानियों के मन में स्वतंत्रता प्राप्ति की चिंता और राष्ट्रीय
भावनाओं से ओत-प्रोत भाव देखने को मिलते हैं । इसी प्रकार भारत के महान समाज
सुधारक राजा राममोहन राय के संपादकत्व में ‘बंगदूत’ का प्रकाशन हिन्दी सहित तीन
अन्य भाषाओं में भी हुआ । हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता का अन्योनाश्रित संबंध है,
क्योंकि हिंदी साहित्य के साथ पत्रकारिता को लेकर चलने का सराहनीय और कर्मठ कार्य
करने का श्रेय बाबू भारतेन्दु और उनके युग के प्रतिनिधियों को जाता है । भारतेन्दु
ने कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, बालबोधिनी आदि पत्रों का सम्पादन किया है ।
इनके युग में प्रसिद्ध लेखकों द्वारा अनेक पत्रिका का सम्पादन हुआ है जो पूर्णतः
राष्ट्रीयता को समर्पित था । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी के महान
पत्रिका ‘ सरस्वती’ के सम्पादन कार्य में 1900 ईस्वी से जुड़े । इसी धारा में गणेश
शंकर विद्यार्थी का भारतीय स्वाधीनता एवं पत्रकारिता के प्रति विशेष अवदान है उनके
द्वारा संपादित पत्रिका ‘ प्रताप’ का प्रारंभ कानपुर से हुआ था राष्ट्रीयभाव से
ओतप्रोत यह पत्रिका स्वाधीनता संग्राम में भारतीय जनता के लिए मार्ग दर्शक बना । इस
पुस्तक में पत्रकारिता के आरंभ के उद्देश्य से लेकर अभी के व्यवसायीकरण तक के सफर
को पूर्ण तटस्थता के साथ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया गया है ।
इस पुस्तक के आलेखों पर दृष्टि डाले तो
सभी आलेख अत्यंत सारगर्भित दृष्टिकोण से लिखा गया है । प्रो. संजय द्विवेदी द्वारा
लिखित आलेख ‘एकात्म मानवदर्शन के आधार पर बने मीडिया दृष्टि’ में पं. दीनदयाल उपाध्याय
जी के पत्रकारिता एवं राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान पर आधारित विस्तृत ढंग से
लेखन किया है। उन्हें चुनावी राजनीति में सफलता नहीं मिली परंतु दिग्गज नेताओं के बीच
यह सामान्य कद काठी वाला, साधारण परिवार का साधारण व्यक्ति एक राष्ट्रीय ऋषि जैसे
प्रतीत होता था । ‘एकात्म मानवदर्शन’ शब्द का प्रयोग दीनदयाल जी अपने आलेखों एवं
भाषणों में करते थे । वह पत्रकारिता को अपने विचारों से अलग नहीं मानते थे, वह यही
दृष्टि रखते थे कि किस प्रकार मीडिया समाज कि एकता, उसकी बेहतरीन और मनुष्य की
मुक्ति में सहायक हो । पश्चिमी मत के अनुसार खबर तभी बनती] है जब कुछ अशोभन हो
परंतु एकात्म भाव सभी सूचना के शुभ दृष्टि पर विचार करता है, उसका लक्ष्य समाज का
जुड़ाव रहा है । भारत में अभी मीडिया पथभ्रष्ट
स्थिति में ही है, बस उन्हे अपनी टी. आर. पी की ही चिंता पड़ी है जिसके कारण वे
सत्यता से पथ भ्रष्ट होकर नकारात्मक घटनाओं को मिर्च-मशालेदार घटनाओं को प्रस्तुत
करने में व्यस्त हैं । इनको दीनदयाल जी की तरह पत्रकारिता लेखन करने की आवश्यकता
है । उनके मत से खबरों, मीडिया, पत्रिका का कार्य राष्ट्रीय भाव व राष्ट्रवाद को
बनाए रखने के साथ-साथ मनुष्य के मध्य एक सकारात्मक उम्मीद का विकसित करना भी
अतिआवश्यक है ।
प्रो. योगेंद्र प्रताप
सिंह द्वारा लिखित आलेख ‘पत्रकारिता के कुछ नए संदर्भ’ में पत्रकारिता का वैश्वविक
जगत् पर संबंध तथा उद्भव और विकास के बारे में बताया गया है । उन्होंने वर्तमान पत्रकारिता
के बिकाऊ स्वभाव और प्रवृत्ति को उजागर करते हुए लिखा है कि “आम चुनाव के समय
जब मतदाताओं को अधिक मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, मतदाता असमंजस में होते हैं,
उस संकट काल में अखबार के पन्ने पहल ही वीक चुके हैं ।” कुछ पत्रकार द्वारा 21 वी सदी में
पत्रकारिता को व्यवसायिक माध्यम बनाने का कूटनीतिक प्रयास किया जा रहा है । जिसके
कारण समकालीन मीडिया का राष्ट्रीयता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा इसकी चिंता
व्यक्त की गई है । और लेखक ने पत्रकारिता का स्तर बनाए रखने के लिए आवश्यक सुझाव
प्रस्तुत किए हैं ।
प्रो.
सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा लिखित ‘भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता: राष्ट्रीय एवं
सांस्कृतिक’ आलेख में उन्होंने भारतेन्दु काल के सक्रिय प्रतिनिधियों के योगदान को
उजागर किया है । तथा भारतेन्दु युगीन हिन्दी पत्रिका के पाठकों राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओत-प्रोत करके
स्वतंत्रता प्राप्ति में सक्रिय बनाया । उस युगीन पत्रकारिता भारतीय एकता, अखंडता
एवं भव्य संस्कृति को पाठक के सम्मुख उपस्थित करने में प्रयासरत थी । ‘हिन्दी
प्रदीप’ पत्रिका में भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृति मध्य तुलना करके लिखा गया है
कि “ पहले गुरुकुल की शिक्षा निःस्वार्थ भाव से ही की जाती थी और पश्चिमी
सभ्यता के अनुसार स्कूलों में शिक्षा देने पर बच्चों से माहवारी रुपया लिया जाता
है। इसी कारण हमारी संस्कृति उत्तम है ।” इस समय के महान संपादकों ने अपने
प्रगतिशील विचारधारा से नव-भारत के निर्माण में अपना विशिष्ट योगदान दिया ।
प्रो. पूरन चंद टंडन द्वारा लिखित आलेख ‘गांधी, जनजागरण और हिन्दी’ में
महात्मा गांधी जी को केंद्र में रख कर तत्कालीन समय को केंद्रित किया है । वर्तमान समय में समाज में नवजागरण और
नवजागृत्ति के उद्देश्य से पत्रकारिता करने पर बल दिया है । उन्होंने बताया है कि गांधी
जी ने एक नवीन युग का सूत्रपात किया था । उन्होंने जो जनजागरण किया था वह अहिंसा
आंदोलन पर आधारित था । गांधी जी ने भारत के समस्त जनता को, समुदाय को, धर्मों और
जातियों को अपने तथा राष्ट्रीय अधिकारों के प्रति शांतिपूर्ण तरीके से सत्याग्रह
करने को आह्वान किया था । उन्होंने स्पष्ट कहा था कि समाज की एकसूत्र भावमाला को
समझने और उन तक विचार पहुंचाने के लिए सामान्य और सुलझी हुई भाषा की आवश्यकता
महसूस होती है और उस समय गांधीजी ने अपने संवाद में हिंदी भाषा को माध्यम बनाया ।
वहीं काम हिंदी पत्रकारिता ने किया ।
प्रो. विनोद कुमार मिश्र द्वारा लिखित आलेख मॅरिशस की हिंदी पत्रकारिता और
भारतीय सांकृति में यह स्पष्ट किया है कि मॉरिशस में भारतवंशियों ने एक साथ नवजागरण, आर्य समाज आंदोलन और हिन्दी
पत्रकारिता का सूत्रपात किया । मॉरिशस में
हिन्दी पत्रकारिता का प्रारंभ प्रवासियों पर अत्याचार के प्रतिरोध में हुआ था । और
यहां हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत गांधी जी की प्रेरणा से श्री मणिलाल द्वारा
‘हिंदुस्तानी’ पत्र से हुई ।अर्थात्
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो हिंदी भाषा को विकासोन्मुखी दिशा प्रदान
करने में भी मॉरीशस की हिंदी पत्रकारिता का योगदा अतुलनीय न है ।
प्रो. हितेन्द्र मिश्र ने ‘स्वाधीनता आंदोलन और हिन्दी पत्रकारिता’ आलेख
में भारतीय स्वाधीनता में हिन्दी पत्रकारिता के अमूल्य योगदान पर अपना सारगर्भित
मत रखे हैं । स्वाधीनता आंदोलन में आदि से अंत तक हिंदी पत्रकारिता का सक्रिय
योगदान रहा है । स्वतंत्रता प्राप्ति में अनेकानेक पत्र संपादकों का योगदान रहा
है, उनमें राजा राम मोहन राय, भारतेन्दु, महात्मा गांधी, अंबेडकर, महर्षि अरविन्द
इत्यादि महापुरुषों की तन्मयता के साथ सक्रिय भूमिका देखी जा सकती है ।
प्रो.
आलोक पांडेय द्वारा लिखित आलेख ‘दिनमान के बहाने समकालीन पत्रकारिता पर एक नजर’ में
उन्होंने पत्रकारिता की आवश्यकता एवं कार्य को दर्शाते हुए समकालीन समाज में
पत्रकारिता के रंग-रूप को पाठक के सम्मुख सक्षम ढंग से प्रस्तुत किए हैं । पत्रकारिता के आरम्भिक काल
में वे न केवल दुनिया को अमानवीय व्यवहार और उनकी क्रूर अराजकता ही नहीं दिखाते है
बल्कि इस प्रकार के घटनाक्रमों की वजह और कारण को खोजपूर्ण तथ्यों के साथ दिखाने
का प्रयास करते हैं । पत्रकारिता आधुनिक जमाने का आईना माना जाता है । उस में
आधुनिक युग निर्माण का एक सकारात्मक सपना भी है । ‘दिनमान’ पत्रिका एवं तत्कालीन
समय में उस पत्रिका का योगदान को दर्शाते हुए दिनमान के प्रति उनकी खुदकी रुचि एवं
शोधकार्य में दिनमान पत्रिका को अपना विषय वस्तु बनने का कारण अत्यंत रोचक एवं
पत्रकारिता का सही अर्थ को दर्शाता है । समकालीन हिन्दी पत्रकारिता की पूर्ण
स्थिति का उल्लेख इसमें देखा जा सकता है ।
लोकेन्द्र
सिंह द्वारा लिखित आलेख ‘माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता और
संस्कृति’ में लेखक ने माखनलाल जी का पत्रकारिता एवं देश के स्वाधीनता में अतुलनीय
योगदान पर विचार व्यक्त किया है। चतुर्वेदी जी अपनी बात को सामान्य जन तक पहुँचाने
के लिए प्रभावी माध्यम के रूप में समाचार पत्र को मानते थे । उन्होंने ‘कर्मवीर’,
‘प्रभा’ आदि पत्र का संपादन किया । लेकिन वे पत्रकारिता के समझौतेवादी प्रवृति से
चिंतित थे। किंतु अपनी पत्रिका में भारतीयता
को सदैव बनाए रखा । अपने समाचार पत्रों में वे न केवल स्वतंत्रता की बात करते बल्कि
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आपनी आवाज को
मुखर किया तथा राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक महत्व के प्रश्नों पर भी समाज को प्रबोधन
दिया । लेखक ने माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता के प्रति लग्न और निष्ठा बखूबी
चित्रण किया है ।
डॉ.
पद्मप्रिया जी द्वारा लिखित ‘वर्तमान संदर्भ में मीडिया और राष्ट्रीय सांस्कृतिक
जागरण’ आलेख के संक्षिप्तकरण की दृष्टिकोण से देखा जाए तो उन्होंने अनेक उदहारणों
के साथ वर्तमान मीडिया जगत के संदर्भ में ज्ञानवर्धक तथ्यों पर प्रकाश डालने का
प्रयास किया है । उन्होंने बताया है कि राजनीति को जनता तक लाने और उन्हें समझाने
के लिए मीडिया या पत्रकारिता एक सशक्त माध्यम है । जब राष्ट्रवाद एवं वर्तमान
मीडिया के संबंध पर दृष्टि डालें तो
राष्ट्रवाद के विपरीत दिशा में आज का मीडिया काम कर रहा है लेखिका ने इसमें एक
महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर किया है जिसे वह पाठक वर्ग को इस मसालेदार खबरों का कारण
मानती है, क्योंकि पाठक के अनुसार एवं उनकी डिमांडानुसार मीडिया का व्यवसाय चल रहा
। उनका मानना है कि इन सबसे तभी छुटकारा मिलेगा जब पाठक वर्ग जागरूक बनेगें।
डॉ.
राजकुमार उपाध्याय ‘मीणा’ द्वारा लिखित आलेख आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का
पत्रकारिता में योगदान’में आधुनिक हिन्दी पत्रकारिता के योगदान पर विस्तृत लेखन
किया है । महाकवि कालिदास आचार्य द्विवेदी जी के प्रिय कवि थे, उनके गुणों के
स्वरूप उन्हें साहित्य भी दोष रहित ही पसंद था । इसलिए इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं
है कि द्विवेदीकालीन हिंदी पत्रकारिता में शुद्धता अत्यधिक थी ।
डॉ.
कंचन शर्मा ‘हिन्दी पत्रकारिता का क्रांतिकारी स्वरूप : ‘चाँद’’ इस आलेख में स्वतंत्रता
प्राप्ति में ‘चाँद पत्रिका’
के क्रांतिकारी योगदान के बारे में महत्वपूर्ण घटनों के उदाहरण के साथ वर्णन किया
गया है । चाँद पत्रिका के ‘फांसी’
अंक के संपादक – आचार्य चतुरसेन शास्त्री थे और इस अंक में तत्कालीन समय के मानवता
एवं राष्ट्रीयभाव व राष्ट्रवाद को एक नवीनतम
स्वरूप प्रदान किया गया । चाँद की पत्रकारिता समाज में भी महत्वपूर्ण स्थान ही रखती
है और ऐतिहासिक गौरवशाली भूमिका भी दर्ज करती है ।
अजय
कुमार द्वारा लिखित आलेख ‘राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक प्रसार में हिन्दी दैनिक
‘दस्तक प्रभात’ का योगदान’ में दस्तक प्रभात पत्रिका के भारत राष्ट्र एवं संस्कृति
के प्रति विशिष्ट योगदान पर चर्चा हुई है । दैनिक दस्तक प्रभात एक समकालीन
प्रादेशिक पत्रिका है । इसका प्रारंभ 1995 ई से हुआ था, यह बिहार और झारखण्ड के स्थानीय
मुद्दों को निष्पक्ष रूप से पाठकों तक पहुँचाती है । यह समानता एवं भातृभाव को
अपने मध्य समाहित करके ही आज तक आगे बढ़ रही है ।
अनीता
देवी द्वारा लिखित आलेख ‘भारतीय सभ्यता में संस्कृति के प्रचार-प्रासर में कल्याण
के विशेषांकों की भूमिका’ में भारतीय संस्कृति को वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार
करने वाले पत्र ‘कल्याण’ के अंकों के बारें में उल्लेख है । इस पत्र के संपादक
हनुमान प्रसाद पोद्दार हैं इस पत्रिका के विशेषांक में भारतीय सभ्यता के पुराणों,
उपनिषदों, योग, रामायण, महाभारत आदि पर अंक निकाला जाता था । इससे विदित् होता है
कि भारतीय संस्कृति के उन्नति में ‘कल्याण’ पत्रिका का बहुत बड़ा योगदान रहा । भारतीय
पौराणिकता के संदर्भों का प्रचार-प्रसार करने का अमूल्य श्रेय ‘कल्याण’ को दिया
जाता है ।
शिव
कैलाश यादव द्वारा लिखित ‘राष्ट्रीयता एवं संस्कृति के विकास में ‘हिन्दी प्रदीप’
की भूमिका’ आलेख में बालकृष्ण भट्ट द्वारा संपादित ‘हिन्दी प्रदीप’ पत्रिका के
संबंध में वर्णन है । यह भारतेन्दु युगीन पत्रिकाओं में से एक महत्वपूर्ण पत्रिका
है, हिन्दी साहित्य को नवीन दृष्टि देने के साथ-साथ यह पत्रिका राष्ट्रीयता को
समर्पित थी । यह तिलक जी के उग्र राष्ट्रीयता से प्रभावित रही । पत्रिका के आरंभ
से अंत तक राष्ट्रीय योद्धाओं के संघर्ष की गाथा ही वर्णित है । स्मरणीय रहे कि राष्ट्र
निर्माण में पाठकों का योगदान दिलवाने तथा
उन्हें प्रेरित करके जोश भरने का जो कार्य हिन्दी प्रदीप ने अत्यधिक जागरूकता तथा
लग्नशीलता के साथ किया था।
वीरेंद्र कुमार सिंह ने
‘छायावाद युगीन पत्रकारिता: राष्ट्रीयता एवं संस्कृति आलेख में छायावादी
पत्रकारिता के विशेषता पर पाठकों की दृष्टि आकर्षण कारवाई है। इस युग में ‘आज’,
‘माधुरी’, ‘समालोचना’, ‘स्वदेश’,
‘कर्मवीर’ आदि महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का आरम्भ हुआ । इस युग के हिन्दी साहित्य के
रचनाकारों ने साहित्य के साथ-साथ पत्रिकाओं में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
साहित्य, संस्कृति, सामाजिक, राष्ट्रीयता,राजनीति आदि से संबंधित अनेक मुद्दे
पत्रिका के विषय बने । अनेक नवीन युवाओं की प्रतिभा पत्रिका के माध्यम से देखने को
मिली जैसे कि– कुछ पत्रिका ग्रामीण एवं कृषि जीवन, नारी जीवन, बाल मनोविज्ञान,
सामाजिक चेतना इत्यादि विषयों पर केंद्रित आलेख प्रकाशित किये जाते थे ।
राकेश
कुमार यादव जी द्वारा लिखित आलेख ‘हंस पत्रिका का राष्ट्रीयता एवं संस्कृति के
प्रसार में योगदान’ इस आलेख में हिन्दी पत्रकारिता जगत की एक विशिष्ट पत्रिका ‘हंस’
के संबंध में विचार प्रस्तुत किये गए हैं । कथा सम्राट प्रेमचंद जी द्वारा
प्रकाशित हंस पत्रिका तत्कालीन समय से लेकर समकालीन समय का सफर करती है । वह अपने
मध्य भारत के भव्य इतिहास के साथ-साथ वर्तमान को भी समाहित कर रही है । अपने
आरंभिक समय से ही ‘हंस’
में देश के प्रति समर्पित भाव दिखायी देता है । हंस निरंतर दमित अस्मिताओं को उभारने
की लड़ाई लड़ती आयी है । समयानुसार सदैव निष्पक्ष होकर निडरता से विपरीत शक्तियों को
शब्दों के माध्यम से चुनौती देने का काम किया है । हंस पत्रिका ने हाशियागत
समुदायों के जीवन आधारित व विविध विमर्शों पर अनेकानेक विशेषांक प्रकाशित किए हैं
। तथा पुरानी रूढ़िग्रस्त मानसिकता से समाज को मुक्त करने का सफल प्रयास
नैरन्तर्यता के साथ कर रही है ।
निष्कर्ष
में देखा जाए तो ‘हिन्दी पत्रकारिता
राष्ट्रीयता एवं संस्कृति’
पुस्तक के संपादक राज कुमार पांडे जी ने
हिंदी पत्रकारिता से संबंधित विभिन्न आलेखों का सफलतापूर्वक संकलन किया है
। इस पुस्तक के सभी लेखकगण बधाई के पात्र हैं जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को
राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद एवं संस्कृति से जोड़कर मौलिक आलेखों को तैयार करके एक
नये ग्रंथ को बनाने में अमूल्य योगदान दिया । मैं इस ग्रंथ के संपादक के साथ-साथ
पुन: सभी रचनाकारों,लेखको और शोधार्थियों को
बधाई देता हूँ ।