राजभाषा हिंदी और वर्तनी

 


राजभाषा हिंदी और वर्तनी

आचार्य. एस.वी.एस.एस.नारायण राजू


उत्कर्ष

जून 2024 छमाही ई - पत्रिका

राजभाषा अनुभाग

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय

भारत सरकार की राजभाषा नीति के अनुपालन के प्रति अधिकारियों/कर्मचारियों में जागरूकता लाने तथा अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में राजभाषा हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के प्रयास में विभिन्न क्षेत्रों में समय-समय पर उत्पन्न समस्याओं का सामना करने तथा उनके सफल समाधान खोजने की प्रक्रिया से अनिवार्यतः गुजरना पड़ता है। राजभाषा नीति संबंध प्रमुख निर्देशों से स्पष्टतः अवगत होकर विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों व अधिकारियों की भाषिक क्षमता, राजभाषा के रूप में हिन्दी में प्रयुक्त शब्दों की राष्ट्रीय ग्राह्यता और अन्य विदेशी व स्थानीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों के सरल एवं व्यावहारिक प्रयोग को दृष्टि में रखकर राजाभाषा के रूप में हिन्दी के स्वरूप को निर्धारित करने तथा उसे जन-जन तक आसानी से पहुँचाने में कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। देश वासियों की भाषिक व सांस्कृतिक भिन्नता के बावजूद आम सहमति से हमें राजभाषा के रूप में हिन्दी के मानक स्वरूप को स्वीकार करने तथा उसके व्यापक प्रचार-प्रसार द्वारा उसे हर दृष्टि से समृद्ध बनाने की आवश्यकता है।

"राजभाषा हिंदी और वर्तनी"

विषय पर चर्चा करने से पहले हमें राजभाषा, राष्ट्रभाषा एवं संपर्क भाषा के अंतर को समझना जरूरी है।

 

संपर्क भाषा

जिस देश में अनेक प्रदेश हों और वहाँ कई भाषाएँ हों, उन्हें एक दूसरे से संपर्क के लिए "संपर्क भाषा" की आवश्यकता पड़ती है। अतः हम कह सकते है कि  संपूर्ण राष्ट्र के विभिन्न भाषा-भाषियों एवं राज्यों के बीच संपर्क स्थापित करने वाली भाषा उस राष्ट्र की "संपर्क भाषा" कहलाती है।

राष्ट्रभाषा

राष्ट्रभाषा से अभिप्रायः है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा अर्थात् संपूर्ण राष्ट्र की सामासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अभिव्यक्ति से समाहित लोकप्रिय भाषा, जो उस राष्ट्र के विभिन्न भाषा- भाषियों द्वारा व्यापक रूप से बोली जाती है और सार्वजनिक कार्यों में उसका प्रयोग होने लगता है, वह राष्ट्रभाषा का प्रतीक बन जाती है।

राजभाषा

राजकाज और जनहित संबंधी शासकीय प्रयोजनों के लिए संघ सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा अधिकृत रूप से प्रयुक्त भाषा राजभाषा होती है। यह शासन और जनता के बीच संपर्क स्थापित करती है। राजभाषा शब्द अंग्रेजी के Official Language के लिए व्यवह्रत होता है। भारतीय संविधान में इसे परिभाषित किया गया है।

संविधान के भाग -5, अनुच्छेद-120 में संसद द्वारा प्रयुक्त भाषा एवं संसद में कार्यव्यवहारों की भाषा के बारे में बताया गया है।

संविधान के भाग -6, अनुच्छेद-210 में राज्यों के विधान मंडलों में सदस्यों द्वारा प्रयुक्त भाषा एवं कार्य व्यवहारों की भाषा से संबंधित है।

राजभाषा और प्रांतीय भाषाओं के संबंध में परिकल्पित संविधान का भाग-17, जिसमें 343 से 351 तक राजभाषा संबंधी प्रावधान निहित हैं  मुंशी अय्यंगार फार्मूला से जाना जाता है।

अनुच्छेद 343 [संघ की राजभाषा]

संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए 26 जनवरी, 1965 तक अंग्रेजी का प्रयोग रहेगा (अनुच्छेद-210 में सूचित कुछेक राज्यों को छोड़कर)। परंतु इस अवधि के पश्चात् संसद चाहे तो अंग्रेजी भाषा का और उसके अंकों के देवनागरी रूप का प्रयोग उपबंधित कर सकेगा। इस बीच 26 जनवरी, 1965 के पूर्व राष्ट्रपति चाहने पर संघ विशेष शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के अतिरिक्त हिंदी एवं देवनागरी अंकों के प्रयोग संबंधी आदेश जारी कर सकेगा।

अनुच्छेद-344 [राजभाषा आयोग एवं संसदीय समिति का गठन]

संविधान की अष्टम् अनुसूची में समाविष्ट भाषाओं के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल करते हुए किसी एक चयनित /नामित व्यक्ति की अध्यक्षता में वर्ष 1955 से 1960 के बीच राष्ट्रपति द्वारा राजभाषा आयोग का गठन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्यों का चयन करने के जरिये संसदीय समिति का गठन किया जाएगा जो राजभाषा आयोग के प्रतिवेदन पर अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को प्रस्तुत करेगी। राष्ट्रपति द्वारा सहमत सिफारिशों के आधार पर उचित निर्देश जारी किए जाएँगे।

अनुच्छेद-345 [राज्य की राजभाषा/राजभाषाएँ]

किसी राज्य के विधान मंडल द्वारा कानूनी तौर पर राज्य के संपूर्ण या आंशिक शासकीय प्रयोजनों के लिए एक या एक से अधिक भाषाओं को अपने राज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जा सकेगा।]

अनुच्छेद-346 [राज्यों के बीच या राज्य और संघ के बीच पत्रादि की भाषा]

संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भाषा एक और दूसरे राज्य के बीच की पत्रादि की भाषा होगी। यदि दो या अधिक राज्य चाहने पर अपने आपसी पत्राचार के लिए हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया जा सकेगा।

अनुच्छेद-347 [राज्य के किसी भाग के जनसमुदाय द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध]

पर्याप्त अनुपातयुक्त किसी विशिष्ट जनसमुदाय द्वारा बोली जाने वाली भाषा को संपूर्ण राज्य के या राज्य के किसी भाग के शासकीय प्रयोजनों के लिए राष्ट्रपति के अनुमोदन से राजभाषा बनाया जा सकता है।

अनुच्छेद-348 [उच्चतम और उच्च न्यायालयों में तथा अधिनियमों, विधेयकों आदि में प्रयोग की जाने वाली भाषा]

अन्य भाषाओं के पाठ को प्राधिकृत माने जाने हेतु राष्ट्रपति के अनुमोदन से संसद द्वारा कानूनी रूप दिलाए जाने तक उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की कार्यवाहियों में संसद और राज्य विधान मंडलों के विधेयकों, आदेशों, नियमों एवं विनियमों में प्रयुक्त भाषाओं का प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा का होगा।

अनुच्छेद-349 [भाषा-संबंधी कुछेक विधियों को अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया]

अनुच्छेद-348 के अंतर्गत उल्लेखित प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषाओं की प्रायोज्यता के संबंध में उपबंध करने वाला कोई भी विधेयक या संशोधन को राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन के बिना पुनः स्थापित नहीं किया जाएगा।]

अनुच्छेद-350 [व्यथा के निवारण के लिए अभ्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा/प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएँ / भाषायी अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विशेष अधिकारी]

कोई भी व्यक्ति अपना वैयक्तिक अभ्यावेदन संघ या राज्य में प्रयोग की जाने वाली भाषा में संघ या राज्य सरकार के कार्यालयों को प्रस्तुत कर सकेगा। राज्यों में अल्पसंख्यक वर्गों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा का माध्यम उनकी मातृभाषा में उपलब्ध कराने की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करनी होगी। इसके अतिरिक्त भाषायी अल्पसंख्यक वर्गों के रक्षोपायों का पर्यवेक्षण उस उद्देश्यार्थ नियुक्त विशेष अधिकारियों द्वारा किया जाएगा]

अनुच्छेद-351 [हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश]

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

 राजभाषा हिन्दी को संघ के शासकीय कार्यो में प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के लिए राजभाषा अधिनियम, 1963 (समय-समय पर यथा संशोधित) को प्रख्यापित किया गया हैं तथा तत्संबंधी राजभाषा (संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग) नियम, 1976 (समय-समय पर यथा संशोधित) को भी प्रख्यापित किया हैं । उपर्युक्त के अतिरिक्त राजभाषा हिन्दी प्रभावी रूप से क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रपति के आदेश, 1960 और संसद के दोनों सदनों राज्यसभा और लोकसभा द्वारा 1968 में राजभाषा संकल्प के नाम से संकल्प पारित किया गया हैं । 

इन सभी नियमों अधिनियमों का पालन करते हुए सरकारी कार्यालयों में हिंदी में कार्य सुनिश्चित किया जा रहा है।  ऐसे संदर्भ में हमें भाषा की वर्तनी पर भी ध्यान देना जरूरी होता है। राजभाषा हिंदी और वर्तनी के बारे में विस्तार से जानने से पहले हमें वर्तनी की परिभाषा पर भी विचार करना चाहिए।

"वर्तनी"

"वर्तनी" शब्द का अर्थ होता है - शब्दों की ठीक और सही रूप में लिखने की क्रिया। यह शब्द शिक्षा, भाषा, और व्याकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण होता है क्योंकि सही वर्तनी से शब्दों का सही अर्थ स्पष्ट होता है और संवाद को स्पष्टता से समझने में मदद मिलती है।

कार्यालयीन क्षेत्रों में इसपर और भी अधिक ध्यान देना जरूरी होता है।

सामान्य जीवन मेंलेखन में या कम्प्यूटरइण्टरनेट तथा ब्लॉग पर हिन्दी में वर्तनी सम्बंधी अनेक गलतियाँ देखी जाती हैं। अशुद्ध वर्तनी भाषा की सुन्दरता को खराब करती है।

जैसे - पञ्चमाक्षर की गलतियाँ

पञ्चमाक्षरों के नियम का सही ज्ञान न होने से बहुधा लोग इनके आधे अक्षरों की जगह अक्सर 'न्' का ही गलत प्रयोग करते हैं जैसे 'पण्डित' के स्थान पर 'पन्डित', 'विण्डोज़' के स्थान पर 'विन्डोज़', 'चञ्चल' के स्थान पर 'चन्चल' आदि। ये अधिकतर अशुद्धियाँ 'ञ्' तथा 'ण्' के स्थान पर 'न्' के प्रयोग की होती हैं।

नियम: वर्णमाला के हर व्यञ्जन वर्ग के पहले चार वर्णों के पहले यदि अनुस्वार की ध्वनि हो तो उस वर्ग का पाँचवा वर्ण आधा (हलन्त) होकर लगता है। अर्थात् कवर्ग (क, , , , ङ) के पहले चार वर्णों से पहले आधा  (ङ्), चवर्ग (च, , , , ञ) के पहले चार वर्णों से पहले आधा  (ञ्), टवर्ग (ट, , , , ण) के पहले चार वर्णों से पहले आधा  (ण्), तवर्ग (त, , , , न) के पहले चार वर्णों से पहले आधा  (न्) तथा पवर्ग (प, , , , म) के पहले चार वर्णों से पहले आधा म (म्) आता है। उदाहरण:

कवर्ग - पङ्कज, गङ्गा

चवर्ग - कुञ्जी, चञ्चल

टवर्ग - विण्डोज़, प्रिण्टर

तवर्ग - कुन्ती, शान्ति

पवर्ग - परम्परा, सम्भव

आधुनिक हिन्दी में पञ्चमाक्षरों के स्थान पर सुविधा हेतु केवल अनुस्वार का भी प्रयोग कर लिया जाता है।

अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी में लिखने पर होने वाली गलतियाँ

ऑ की गलतियाँ

लेखन की गलती: '' तथा '' ये दोनों आगत ध्वनियाँ कही जाती हैं जो कि हिन्दी में विदेशी भाषाओं विशेषकर अंग्रेजी से आयी हैं। इनका उपयोग अंग्रेजी की दो विशिष्ट ध्वनियों के लिये होता है। '' की ध्वनि '' तथा '' के लगभग बीच की है,

उदाहरण: बॉस (Boss), हॉट (Hot) आदि।

अनुस्वार तथा अनुनासिक की गलतियाँ

अनुस्वार (ं) के स्थान पर अनुनासिक (ँ) तथा अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) लिख दिया जाता है। विशेषकर अनुनासिक के स्थान पर अनुस्वार को लिखे जाने की गलती अधिक प्रचलित है और इसे एक प्रकार की अघोषित स्वीकृति भी मिल गयी है। कुछ उदाहरण हैंजैसे – हंस (एक जल पक्षी), हँस (हँसने की क्रिया)।

नुक्ते की गलतियाँ

उर्दू से हिन्दी में लिये गये शब्दों में नुक्ता लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाओं के कुछ शब्दों में भी नुक्ते का उपयोग होता है। नुक्ता भाषा विशेष की सही ध्वनि को प्रकट करता है लेकिन हिन्दी में लिखते समय प्रायः कई बार लोग नुक्ता लोप कर देते हैं।

साधारण प्रचलित अशुद्ध वर्तनियाँ

हिन्दी में बहुत से शब्द हैं जिनकी वर्तनी साधारणतः त्रुटिपूर्ण लिखी जाती है। इन वर्तनियोँ के प्रिण्ट मीडिया में उपस्थित होने से साधारण व्यक्ति इन्हें ही शुद्ध मानने लगता है।

 

अशुद्ध

शुद्ध

अशुद्ध

शुद्ध

 हिन्दु

हिन्दू

प्रदर्शिनी

प्रदर्शनी

हस्पताल

अस्पताल

परिक्षा

परीक्षा

स्त्रोत

स्रोत (Source)

गल्ती

गलती

सप्ताहिक

साप्ताहिक

क्रपा

कृपा

सन्यासी

संन्यासी

आर्शीवाद

आशीर्वाद

संसारिक

सांसारिक

अत्याधिक

अत्यधिक

श्रृंगार

शृंगार

विन्डो

विण्डो

श्रृंखला

शृंखला 

महत्वपूर्ण

महत्त्वपूर्ण

श्रीमति

श्रीमती

बिमार

बीमार

शारिरिक

शारीरिक

प्रोद्योगिकी

प्रोद्यौगिकी 

शताब्दि

शताब्दी

प्रसंशा

प्रशंसा

उच्चारण की गलतियाँ

, श तथा ष का अशुद्ध उच्चारण

कई लोग '' तथा '' का उच्चारण भी '' की तरह ही करते हैं जैसे 'इंगलिश' को 'इंगलिस' बोलना, 'षडयन्त्र' को 'सडयन्त्र' बोलना आदि।

ऋ का अशुद्ध उच्चारण

'' का उत्तर भारत में उच्चारण 'रि' की तरह तथा दक्षिण भारत में 'रु' की तरह होता है। कई स्थान पर इसका उच्चारण 'र्'की भांति भी होता हैं,जैसे 'कृषि' का 'क्रषि', 'मातृ' का 'मात्र'इत्यादि।

ज्ञ का अशुद्ध उच्चारण

'ज्ञ' का भारत के विभिन्न हिस्सों में उच्चारण भिन्न-भिन्न तरीके से होता है, उत्तर भारत के हिन्दी भाषा क्षेत्रों में प्रायः इसका उच्चारण 'ग्य' की तरह किया जाता है। इसका सही उच्चारण भी वर्तमान में लुप्त हो चुका है।इसका शुद्ध उच्चारण (ज्+ञ) होता हैं।

क्ष का अशुद्ध उच्चारण

आजकल 'क्ष' का उच्चारण '' की तरह आम तौर पर सुनने को मिलता है जैसे 'क्षत्रिय' को 'छत्रिय' बोलना।

ङ का अशुद्ध उच्चारण

प्रायः पञ्चमाक्षरों से अपरिचित लोग '' का उच्चारण 'ड़' की तरह करते हैं।

आधे अक्षरों का पूरे अक्षरों की तरह उच्चारण

कुछ लोग कुछ शब्दों में आने वाले आधे अक्षरों (हलन्त युक्त) का पूरे अक्षरों की तरह उच्चारण करते हैं। उदाहरण के लिये 'प्रश्न' का उच्चारण 'प्रशन' की तरह, 'महत्व' का उच्चारण 'महतव' की तरह, 'प्रयत्न' का उच्चारण 'प्रयतन' की तरह आदि।

टाइपिंग की गलतियाँ

 ये वे अशुद्धियाँ हैं जो आमतौर कम्प्यूटर अथवा अन्य कम्प्यूटिंग डिवाइसों पर टाइपिंग के दौरान होती हैं। अंग्रेजी में इस प्रकार की अशुद्धियों को टाइपो एरर कहा जाता है। कई बार तो इन पर टाइपकर्ता का ध्यान नहीं जाता या टाइपकर्ता को शब्दों की सही जानकारी न होने के कारण होता है।  

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि यदि शब्दों के सही उच्चारण या उसके अर्थ का यदि पूरा ज्ञान न होने पर शब्दों का अर्थ में बदलाव आ सकता है। इसलिए लिखते समय या बोलते समय हमें शुद्ध वर्तनी पर ध्यान देना जरूरी है।

सरकारी कार्यालयों में राजभाषा नीति का अनुपालन कैसे किया जाएँ एवं उसे करते समय आने वाली कठिनाईयाँ

सरकारी कार्यालयों में राजभाषा नीति का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु विभिन्न कार्यक्रम किए जाते हैं जैसे-

1.  सभी कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठक आयोजित की जाती है। जिसमें राजभाषा अनुपालन की प्रगति पर विस्तार से चर्चा की जाती है। जिसके लिए बैठक की कार्यसूची, कार्यवृत्त आदि तैयार किया जाता है।

2.  प्रत्येक शहर में एक नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन किया जाता है जिसके अंतर्गत उस शहर के सभी केंद्र सरकार एवं अधीनस्थ कार्यालय आते है जो प्रत्येक कार्यालय में किए जा रहे राजभाषा अनुपालन को सुनिश्चित करें।

3.  हिंदी पखवाड़ा समारोह एवं विश्व हिंदी दिवस के दिन विभिन्न प्रतियोगिताओं को आयोजित कर कर्मचारियों में हिंदी भाषा के प्रति रुचि उत्पन्न करना ।

4.  हिंदीतर कर्मचारियों में हिंदी सीखने की रुचि उत्पन्न करना एवं हिंदी शिक्षण योजना की परीक्षाओं उत्तीर्ण करना

5.  राजभाषा अधिनियम -1963 की धारा 3(3) में उल्लिखित 14 कागजातों को द्विभाषी करना।

6.  हिंदी कार्यशालाएँ आयोजित करना

इन सब से राजभाषा हिंदी का अनुपालन सुनिश्चित किया जाता है।

इसका अनुपालन सुनिश्चित करते समय विभिन्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जैसे

1.  कुछ हिंदीतर भाषी जो हिंदी का अपनाने के लिए तैयार नहीं है उन्हें इसकी आवश्यकता बताना या उनमें रुचि उत्पन्न करना कठिन कार्य हो जाता है।

2.  राकास या नराकास की बैठक की अनिवार्यता को बार-बार दुहराने की आवश्कता पड़ती है।

3.  दस्तावेज़ो का अनुवाद करते समय प्रशासनिक, तकनीकी, विधि, चिकित्सा संबंधी शब्दों का सटीक अर्थ मिलना कठिन होता है। कभी-कभी शब्दों के अर्थ का यदि सही ज्ञान न हो तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

4.  नाम पट्ट पर नाम के साथ आद्यक्षर लिखते समय भी यह देना होता है कि उसकी वर्तनी सही है या नहीं।

5.  दस्तावेज़ो का अनुवाद तुरंत माँगने से उसका पुनरीक्षण कर पाना कठिन होता है।

 

संदर्भ

1.   राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी - लेखक: मनोज भारती - जनवरी 31, 2010, https://gunjanugunj.blogspot.com/2010/01/blog-post_31.html

2.   राष्ट्रभाषा, राजभाषा, संपर्क भाषा तथा राष्ट्रीय भाषाएँ – हरि बाबू कंसल – राजभाषा भारती पत्रिका अक्टूबर-दिसंबर 1991 https://rajbhasha.gov.in/sites/default/files/rb55.pdf

3.   विकिपीडिया:हिन्दी में सामान्य गलतियाँ

4.   राजभाषा सहूलियतकार – डॉ. वी. वेंकटेश्वर राव

 


 

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