"पारिवारिक संघर्ष की कहानी : माफिया"

 


             "पारिवारिक संघर्ष की कहानी : माफिया"

आचार्य.एस.वी.एस.एस.नारायण राजू

Sravanti.

Monthly

September- October 2024

ISSN 2582-0885


गिरीश पंकज द्वारा लिखा गया उपन्यास माफिया एक व्यंग्य उपन्यास होते हुए भी समाज की सच्चाई को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है. इस उपन्यास का प्रमुख कथ्य बहुमुखी साहित्य माफिया है, जो साहित्यिक जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार और स्वार्थी प्रवृत्तियों को उजागर करता है. लेखक ने व्यंग्य के माध्यम से न केवल समाज में फैली विकृतियों पर प्रहार किया है, बल्कि एक आदर्शवादी साहित्यकार की आंतरिक मनोव्यथा, उसकी आकांक्षाएँ, उपेक्षाएँ और उसके टूटते हुए सपनों को भी जीवंत रूप से उकेरा है.

उपन्यास के मुख्य पात्र ज्ञानेन्द्र, जो एक साहित्यकार हैं, उनके घर की दुर्दशा के माध्यम से लेखक ने यह दिखाया है कि किस प्रकार आदर्शवादी साहित्यकार, जो समाज को सुधारने का प्रयास करता है, स्वयं समाज की उपेक्षा का शिकार हो जाता है. ज्ञानेन्द्र की परिस्थितियाँ उस साहित्यिक माफिया के विरुद्ध उनकी संघर्षशीलता और अंततः उनके सपनों के टूटने की करुण कहानी बयां करती हैं.

यथा "कल बच्चे की मंथली फीस जमा करनी है घर का किराया भी तो देना है. दो महीने हो गए. वह तो शुक्र मनाओ, अखबार का मालिक नहीं है यह मकान- मालिक, वरना धक्के मारकर निकाल देता. तुम्हारे सेठ में संवेदना बची है कि नहीं." (1)

ज्ञानेन्द्र की पत्नी सुनीता बहुत परेशान थी. तीन महीने से ज्ञानेन्द्र को वेतन नहीं मिला था, और उनके दो बच्चों की स्कूल फीस भरनी थी, साथ ही घर का किराया भी देना था. इन सबकी चिंता ने सुनीता को गहरी उदासी में डाल दिया था. वह सोच रही थी कि शाम का चूल्हा कैसे जलेगा. सुनीता की चिंता और बढ़ जाती है जब वह ज्ञानेन्द्र से कहती है, "अखबार का मालिक तो वेतन नहीं दे रहा, लेकिन मकान मालिक किराया न मिलने पर हमें यहाँ से निकाल देगा." सुनीता की ये बातें उसकी गहरी चिंता और अनिश्चित भविष्य की ओर इशारा करती हैं, जिससे वह मानसिक और भावनात्मक रूप से टूटने की कगार पर पहुँच गई थी. यथा "कहाँ चले गए थे? कितनी पेशान हो गई थी मैं ! फोन क्यों नहीं किया?" (2)

यह सुनीता का सवाल था, जो पैसे की तंगी के कारण हर रोज़ ज्ञानेन्द्र से पूछती थी. पैसे की कमी से वह घर का किराया नहीं दे पा रही थी, और बच्चों की स्कूल फीस भी अदा नहीं हो पा रही थी. उस दिन जब सुनीता ने ज्ञानेन्द्र से अपनी चिंताएँ साझा की, तो ज्ञानेन्द्र ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, "सब ठीक हो जाएगा." ऐसा कहकर वह अपने स्कूटर पर सवार होकर कहीं चले गए.

रात नौ बजे तक सुनीता ने ज्ञानेन्द्र को प्रेस में फोन लगाया, ललितकिशोर के घर पर भी फोन किया, यहाँ तक कि लाइब्रेरी में भी फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. आखिरकार, जब साढ़े नौ बजे ज्ञानेन्द्र घर लौटे, तो उन्होंने पाया कि सुनीता ने अपना हार बेच दिया था.

तब ज्ञानेन्द्र ने कहा कि "मुझे समझाने की कोशिश मत करो. बिना मेरी इजाज़त के तुमने अपना कीमती हार क्यों बेच दिया? क्या सोचेंगे तुम्हारे माँ-बाप कि कैसा नालायक दामाद है, अपनी पत्नी के गहने बेचकर गुजर बसर कर रहा है? छि......शर्म आ रही है मुझे अपने आप पर. क्यों किया सुनीता, तुमने ऐसा क्यों किया ?" (3)

घर में पैसे की कमी के कारण सुनीता ने अपना हार बेच दिया, जिससे उसे कुछ पैसे मिले. लेकिन जब ज्ञानेन्द्र को इस बात का पता चला, तो वह नाराज़ हो गया. हालाँकि, सुनीता ने यह कदम घर की तंग हालत को देखते हुए उठाया था. उसकी मंशा किसी को शर्मिंदा करने की नहीं थी, बल्कि परिवार की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने की थी. "मैंने पहले ही कहा था, फालतू बातों पर ध्यान मत दिया कीजिए, लेकिन आपने मेरी एक नहीं मानी." (4)

ज्ञानेन्द्र पुरस्कार न मिलने से बेहद दुखी था. वह खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा था. तब सुनीता ने उसे ढांढस बंधाया, "आप बस लिखते रहिए, जैसा लिख रहे हैं. एक दिन जनता आपको सच्चा पुरस्कार देगी." हालाँकि, ज्ञानेन्द्र के मन से यह निराशा नहीं जा रही थी. वह अपने स्कूटर पर बाहर निकला, और रास्ते भर उसके दिमाग में जानकीशरण को मिले पुरस्कार की प्रमुखता से की गई खबरें गूँजती रहीं. मीडिया द्वारा उसके साथ किए गए अन्याय को याद कर उसका दिल भारी हो गया. वह लगातार सोचता रहा, "आखिर क्यों ईमानदारी से काम करने वालों को इस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है?" अपने विचारों में खोया हुआ ज्ञानेन्द्र स्कूटर चलाते हुए अनजाने में एक ट्रक से जा टकराया. वह स्कूटर समेत सड़क पर गिर पड़ा. सौभाग्य से उसने हेलमेट पहन रखा था, जिससे सिर सुरक्षित रहा, लेकिन उसका दायां हाथ टूट गया. दुर्घटना की खबर सुनते ही सुनीता चीख पड़ी. उसकी आँखों से आँसू बहने लगे. उसने रोते हुए कहा, "मैंने पहले ही कहा था कि आप इन बातों पर ध्यान मत दीजिए." "अरे, उठ गए, आज तो आप बहुत देर तक सोते रहे. लगता है, कोई अच्छा सपना देख रहे थे. अपनी प्रशंसिकाओं से घिरे हुए थे शायद?" (5)

ज्ञानेन्द्र एक सपना देख रहे थे, इसलिए वह देर से उठे. जब सुनीता ने देखा कि वह अभी तक सो रहे हैं, तो उन्होंने पूछा, "आप कोई अच्छा सपना देख रहे थे? शायद कोई पुरस्कार या सम्मान मिलने का सपना?" लेकिन ज्ञानेन्द्र का सपना पुरस्कार का नहीं था—वह मृत्यु का सपना था. उन्होंने सपने में देखा कि उन्हें एक अमरीकी पुरस्कार मिला, लेकिन यह पुरस्कार उन्हें उनकी मृत्यु के बाद मिला. उनके मित्र, साहित्यकार और कई अन्य लोग उनके सामने एकत्रित हुए थे, मानो श्रद्धांजलि देने आए हों. ज्ञानेन्द्र ने सोचा, "जीते-जी जो पुरस्कार नहीं मिला, वह मरने के बाद मिला." इन्हीं विचारों में खोए हुए वह देर से उठे थे.

"तुम तो मेरी असली ताकत हो. सच तो ये हैं कि तुम्हारे बगैर मेरी खैर नहीं है. एक तरफ पूरी दुनिया है. दूसरी तरफ केवल तुम हो. " (6)

 ज्ञानेन्द्र मुस्कराते हुए बोले, "कभी-कभी प्यारे सपने भी आते हैं." फिर प्यार भरी नज़रों से सुनीता की तरफ देखते हुए कहा, इतना कहने पर, सुनीता ने मुस्कराते हुए रसोई की ओर जाते हुए आवाज़ लगाई, "चलो, अब उठ भी जाओ! नाश्ता तैयार है." "दस बज चुके हैं. दफ्तर के लिए तैयार नहीं होना है क्या?" (7)

ज्ञानेन्द्र और ललितकिशोर बातचीत करते-करते सविता से कविता तक पहुँच गए. दोनों आपस में ग़ज़लें सुनाते और कहते रहे. इस बातचीत में इतना खो गए कि ज्ञानेन्द्र को दफ्तर जाने की देर हो रही थी, लेकिन उन्होंने समय का ध्यान ही नहीं दिया. तभी उनकी पत्नी सुनीता ने कमरे में आकर कहा, "दस बज गए हैं, दफ्तर के लिए तैयार होना है." यह सुनते ही ज्ञानेन्द्र अचानक हड़बड़ा गए और बोले, "अरे, मैं तो भूल ही गया था!" फिर जल्दी-जल्दी तैयार होने लगे. "चलो, कोई बात नहीं," ज्ञानेन्द्र ने कहा, "घर की चिंता में हम दोनों ने जो भी किया, उससे पन्द्रह हज़ार रुपये तो एकत्र हो गए. कुछ समय की चिंता दूर हो गई. रही स्कूटर की बात, लो यह ज़माना. किस्तों का है, कल फिर खरीद लेंगे. किताब की रॉयल्टी तो आने दो." (8)

बच्चों की मंथली फीस जमा करने के लिए सुनीता और ज्ञानेन्द्र को मजबूर होकर अपना स्कूटर और सुनीता का सोने का हार बेचना पड़ा. जब सुनीता ने अपना हार बेचा, तो ज्ञानेन्द्र को बहुत दुख हुआ. उसने चिंतित होकर कहा, "सुनीता के माँ-बाप क्या सोचेंगे? वह यही मानेंगे कि उनका नालायक दामाद अपनी पत्नी के गहने बेचकर गुजर-बसर कर रहा है." यह सोचकर ज्ञानेन्द्र को गुस्सा भी आया, लेकिन कुछ देर बाद उसने अपने आप को संभालते हुए सुनीता से कहा, "हम दोनों ने घर की चिंताओं के कारण ही ऐसा किया है. इससे पंद्रह हज़ार रुपये भी मिल गए हैं. अब हमें किताब की रॉयल्टी मिलने पर कुछ और करने की योजना बनानी चाहिए." "अब तुम भी मज़ाक करने लगी." ज्ञानेन्द्र के चेहरे पर मुस्कान मॅंडराने लगी, "भूख लगी है. आओ, आज साथ-साथ खाएँ. बच्चे आज जल्दी सो गए क्या ?" (9)

ज्ञानेन्द्र पिछले कुछ दिनों से घर की समस्याओं को लेकर बेहद परेशान था. बच्चों की मंथली फीस भरनी थी और घर में अनाज भी खत्म हो गया था. इन चिंताओं के चलते उसने मजबूरी में अपना स्कूटर भी बेच दिया था. लेकिन जब पैसे मिल गए और वह घर लौटा, तो देखा कि बच्चे पहले ही सो चुके थे. सुनीता ने सोते हुए बच्चों को उठाने की कोशिश की, मगर ज्ञानेन्द्र ने उसे रोकते हुए कहा, "सोते हुए बच्चों को समय से पहले नहीं उठाना चाहिए." इसके बाद, दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया. खाना खाते-खाते, ज्ञानेन्द्र को लखनऊ से एक पत्र मिला. पत्र पढ़ते ही वह खुशी से झूम उठा और सबसे पहले उसने सुनीता के गालों पर प्यार से चूमा. इस खुशी के माहौल में उनके बच्चे, सुविज्ञा और सुज्ञान, पूरे मोहल्ले में जाकर ढिंढोरा पीटने लगे, मानो कोई बड़ी खुशखबरी सबको सुनानी हो. "पता है, हमारा पापा को ग्यारह हज़ार रुपये का इनाम मिला है. लखनऊ जाएँगे इनाम लेने. " (10)

ज्ञानेन्द्र के काव्य संग्रह एक उदास तितली का गीत को लखनऊ की साहित्यिक संस्था 'अभिज्ञान' ने ग्यारह हज़ार रुपये का 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पुरस्कार' देने का निर्णय किया. यह खबर सुनते ही सुनीता और उनके दोनों बच्चे, सुविज्ञा और सुज्ञान, बहुत खुश हो गए. बच्चों ने गर्व से पूरे मोहल्ले में जाकर कहा, "हमारे पापा को ग्यारह हज़ार रुपये का इनाम मिला है!" इस खुशी के पल को और साझा करने के लिए ललितकिशोर ने सभी अखबारों के लिए यह समाचार जारी कर दिया. लेकिन अगली सुबह, रौशनपुर के किसी भी बड़े अखबार में इस खबर का एक शब्द भी नहीं छपा. ज्ञानेन्द्र और उनके परिवार की खुशी पर यह उदास चुप्पी छा गई, जो साहित्यिक सफलता के बावजूद मीडिया द्वारा अनदेखी किए जाने की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करती है.

"तुमने ठीक पहचाना, लेकिन वह चाहकर भी अपनी ओर से पहल नहीं कर रही. तुम अपनी ओर से आगे बढ़ोगे, तो वह जैसा चाहती है, वैसा हो जाएगा. लेकिन खबरदार ! " ज्ञानेन्द्र ने चेताया, "देखो ज्ञानप्रकाश पांडे की बेरूखी के कारण उसकी पत्नी भी बेवफाई के रास्ते पर चल पड़ी है. पांड़े भेड़ी किलर है. शोध छात्राओं के साथ उसके काले कारनामे सभी जानते हैं. उसकी पत्नी भी ये बातें जानती है. पांडे अपनी पत्नी पर ध्यान नहीं देता. जब देखो, शोध छात्राओं को गाइड़ करता रहता है. कई बार तो विश्वविद्यालय में नई-नई छात्राओं के साथ घूमता नज़र आता है. अब जब कभी इसकी पत्नी मायके चली जाए, तो देखो इसके जलवे. न जाने कितनी लड़कियों के साथ इसने कुकर्म किये हैं, साले ने. ऐसे लोगों के कारण ही तो आजकल गाइड़ों के प्रति लोगों की अच्छी धारणा नहीं है. पांड़े की पत्नी को अपने पति के बारे में सब कुछ पता है, लेकिन करे भी तो क्या ? शादीशुदा औरत है. बार-बार मायके जा नहीं सकती. पति के हाथ-पैर तोड़ नहीं सकती. अंततः गुमराह तो जाने वाली ऐसी औरतें मायावती पांड़े बन जाती हैं." (11)

सुरेश बार-बार डॉ. पांडे की पत्नी की हरकत को याद करता रहा. वह सोच में डूबा था कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या श्रीमती पांडे एक चरित्रहीन महिला हैं? पहली नजर में तो ऐसा नहीं लगता था, फिर भी उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या यह सब अनजाने में हुआ था या जानबूझकर? जब उसने इस बारे में ज्ञानेन्द्र से बात की, तो ज्ञानेन्द्र ने कहा, "पांडे अच्छा आदमी नहीं है, और उसकी पत्नी को यह बात अच्छी तरह मालूम है. शायद इसलिए ही श्रीमती पांडे इस तरह का व्यवहार करती हैं." इसी बीच, ज्ञानेन्द्र को 'निराला पुरस्कार' मिलने की खुशी थी, लेकिन वह यह देखकर निराश था कि जब किसी कलक्टर को सम्मान मिलता है, तो उसकी खबर प्रमुखता से छापी जाती है, जबकि जब एक लेखक को उससे बड़ा सम्मान मिलता है, तो उसकी खबर तक नहीं बनती. इस अनदेखी ने ज्ञानेन्द्र को बहुत दुखी कर दिया. उसने अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, "महत्व राशि का नहीं, सम्मान का होता है." ज्ञानेन्द्र ने सुनीता को आवाज़ दी "बधाई हो, तुम्हारी किताब छप रही है." सुनीता दौड़ी-दौड़ी आई, "अच्छा लेटर आ गया, कब तक आ रही है ?" (12)

एक दिन ज्ञानेन्द्र को प्रकाशक शर्मा जी का पत्र मिला, जिसमें पाँच हजार रुपये का ड्राफ्ट भी शामिल था. पत्र में लिखा था, "पाँच महीने में आपकी किताब मार्केट में आ जाएगी. मुझे पूरा विश्वास है कि आपकी कृति पर अच्छी-खासी चर्चा होगी." रॉयल्टी की राशि तो कम थी, लेकिन ज्ञानेन्द्र की खुशी का ठिकाना नहीं था. उसकी सबसे बड़ी खुशी इस बात से थी कि उसकी कृति अब दूर-दूर तक पहुँचेगी और पाठकों तक अपनी जगह बनाएगी. जब ज्ञानेन्द्र ने यह खुशखबरी सुनीता को सुनाई, तो उसने मुस्कराते हुए कहा, "आपकी मेहनत आखिरकार रंग लाई. जब परिवार, खासकर पत्नी का सहयोग हो, तो कोई भी मंज़िल हासिल की जा सकती है." उपन्यासकार गिरीश पंकज ने भी अपने उपन्यासों में पारिवारिक यथार्थ का चित्रण अत्यंत सटीक ढंग से किया है, जिसमें परिवार के सहयोग और समर्थन का महत्व बार-बार उभरकर सामने आता है.

संदर्भ :

1. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 55

2. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 56

3. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 57

4. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 166

5. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 176

6. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 17

7. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 57

8. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 58

9. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 69

10. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 141

11. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 165

12. गिरीश पंकज - माफिया, पृ. सं. 170

 


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