लिव-इन-रिलेशनशिप पर तटस्थ विचार : कस्बाई सिमोन
लिव-इन-रिलेशनशिप पर तटस्थ विचार : कस्बाई सिमोन
आचार्य. एस.वी.एस.एस.नारायण राजू
पत्रिका का लिंक निम्न है।
https://drive.google.com/file/d/1NizotmM8zLOKsezD-imERoUCu7ipgjSW/view
लिव-इन-रिलेशनशिप पर तटस्थ विचार :
कस्बाई सिमोन
आचार्य. एस.वी.एस.एस.नारायण राजू
समाज दिन प्रतिदिन आधुनिकता की ओर तेज रफ्तार से गति कर रहा है. युवा पीढ़ी सामाजिक नियम को सिरे से नकारने में लगे हैं, एक पक्ष के बहस से वह सभी सामाजिक बंधन, जीवन जीने की पद्धति को नकरात्मकता से ही देखने लगे हैं और अधिक से अधिक पाश्चात्य की और उन्मुख हो रहे हैं. पाश्चात्य चलन में लिव इन रिलेशनशिप अभी के समय का एक केन्द्रीय मुद्दा बना हुआ है. शरद सिंह द्वारा रचित उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ इसी संबंध को तटस्थ होकर देखने का एक विषयवस्तु प्रदान करता है. भारतीय संस्कृति के वैदिक काल में आठ प्रकार के विवाह पद्धतियों में गंधर्व विवाह को आज के लिव- इन- रीलशन के साथ तुलना किया जा रहा है. भारत में लिव- इन- रीलशन को 1978 में हाईकोर्ट द्वारा मान्यता मिली है. हिन्दी के शब्दकोश में इसे सहजीवन, सहजीवी जैसे शब्दों से अनूदित किया गया है. लिव-इन- रीलेशनशिप का एक साधारण अर्थ यह है कि वैवाहिक बंधन में न बंध कर दो व्यक्ति पति-पत्नी जैसे शारीरिक संबंध रखते हुए जीवन यापन करते हैं एवं संबंध विच्छेद के लिए भी उन्हें किसी कानूनी कार्यवाही से नहीं गुजरना पड़ता है. यह आधुनिक समय का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन चुका है. सम्पूर्ण विश्व के युवा इसे अपने जीवन के स्वाधीनता के रूप में देख रहे हैं. इसे विवाह के सही एवं आधुनिक विकल्प के रूप में स्वीकार कर रहे हैं.
समकालीन हिन्दी लेखिका शरद सिंह द्वारा लिखी ‘कस्बाई सिमोन’ भारत के कस्बों में रहने वाली सुगंधा के जीवन पर आधारित है जिसमें लेखिका ने लिव-इन-रिलेशन को भारतीय पृष्ठभूमि में दिखाने का सफल प्रयास किया गया है. लेखिका उपन्यास के प्रारंभ में ही ‘अपनी बात’ में यह स्पष्ट कर देती हैं कि “लिव-इन-रिलेशन महानगरों में एक नई जीवनचर्या के रूप में अपनाया जा रहा है. माना जाता है कि स्त्री इसमें अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित अनुभव करती है. उसे जीवन साथी द्वारा दी जाने वाली प्रताड़ना सहने को विवश नहीं होना पड़ता है. वह स्वयं को स्वतंत्र पाती है. महानगरों में अपरिचय का वह वातावरण होता है जिसमें पड़ोसी परस्पर एक-दूसरे को नहीं पहचानते हैं. कस्बों में सामाजिक स्थिति अभी धुर परंपरागत है. ऐसे वातावरण में एक स्त्री यदि ‘लिव-इन-रिलेशन’ को अपनाती है तो उसे क्या मिलता है? और वह क्या खोती है? .. क्या एक कसबाई औरत ‘लिव-इन-रिलेशन’ में मानसिक सुकून पा सकती है ? उसे किन-किन स्तरों पर समझौते करने पड़ते हैं? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर के रूप में उपस्थित है मेरे इस उपन्यास की नायिका.”1 जिस पाश्चात्य परंपरा को ग्रहण किया जा रहा है उसका परिवेश, पाश्चात्य जीवन शैली अलग और भारतीयों का अलग है फिर भी भारत में इस प्रकार के संबंध से स्त्री के जीवन शैली में क्या परिवर्तन आता है एवं भारतीय समाज में इसका आना स्त्री के कितने पक्ष एवं कितने विपक्ष में है लेखिका ने बड़े ही शोध परख दृष्टि से पाठकों तक सच्चाई को पहुँचाने का प्रयास किया है.
लेखिका ने कथावस्तु में कई सारी समकालीन प्रश्नों को भी उजागर किया एवं सामाजिक रूप से उनके उत्तर देने का भी प्रयास किया है. प्रथम प्रश्न आज के युवा वर्ग क्यों विवाह जैसे एक सामाजिक बंधन से भाग रहे हैं ? इसका उत्तर देते हुए इस उपन्यास की मुख्य पात्र सुगंधा कहती है कि “विवाह न करने का निर्णय मेरा अपना था. इसमें प्रत्यक्षतः किसी का दबाव नहीं था. हाँ, अप्रत्यक्ष में वे सारी परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं जिन्होंने मुझे रिश्तों के घुटन भरा बंधन मानने को विवश कर दिया.”2 सुगंधा के माता-पिता सामाजिक रूप से एक सभ्य परिवार से थे परंतु अंदरूनी सच्चाई तो सुगंधा रोज ही देखती थी एक किशोर होती लड़की अपने माता-पिता को रोज लड़ते-झगड़ते एवं अपने पिता का अपने ही शोध छात्राओं के साथ अनैतिक संबंध को देखते सुनते हुए बड़ी होती है. बड़े होते बच्चों के लिए समाज का, सभ्यता का, संस्कार, परंपरा, नियम, कानून सब कुछ परिवार ही होता है वह अपने माँ-बाप के संबंध से ही प्रेम, सहयोग, सम्मान एवं विवाह जैसे संबंधों का आकलन करने लगती है. उसी आयु में सुगंधा जैसी आधुनिकता के दहलीज में खड़ी लड़कियां अपने माँ को सहनशील, त्यागमयी, पतिव्रता नारी के रूप में जीवन को यातनाओं से बिताती हुई देखती हैं एवं पिता रूपी पुरुष को अय्याशी, स्त्री को अपना दास मानने वाले, अपने पर-स्त्रीगामिता को पौरुष कहने वालों को देख विवाह संस्थान से घृणा करना मनोविश्लेषणात्मक रूप से सही भी है, सुगंधा की सोच को युवा पीढ़ी के सोच के प्रतिमान के रूप में देखना चाहिए वह इस विवाह संस्थान पर प्रश्न उठाते हुए कहती है कि “ब्याहता हो तो अपनी मांग में विवाह का साक्ष्य भरकर घूमो! पुरुषों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे कोई भी साक्ष्य रखें। हर विवाहित पुरुष यूं भी दूसरी औरतों को मूर्ख बनाने के लिए पत्नी पीड़ित होने का ढोंग करने में तनिक भी नहीं हिचकता है। उफ! यह विवाह की परिपाटी. गढ़ी तो गई स्त्री के अधिकारों के लिए जिससे उसे और उसके बच्चों को सामाजिक मान्यता, आर्थिक संबल आदि-आदि मिल सके किन्तु समाज ने ही इसे तमाशा बना कर रख दिया. मैं इस तमाशे को नहीं जीना चाहती थी. मैंने सोच रखा था कि मैं कभी विवाह नहीं करूंगी. माँ के अनुभवों की छाप मेरे मन-मस्तिष्क पर गहरे तक अंकित थी. उसे मैं चाहकर भी मिटा नहीं सकती थी.”3 सुगंधा विवाह के आरंभिक कारणों को दर्शाते हुए अत्यंत स्पष्टता के साथ कहती है कि विवाह पद्धति स्त्री के अधिकारों का रक्षक था परंतु आज के समय में यह पद्धति मानो स्त्री पर पुरुष का एकेश्वरवादी अधिकार बन चुका है. पितृसत्ता से संक्रमित यह समाज स्त्री को विवाह कर उसको अपनी संपत्ति या घर सजाने की वस्तु जैसे व्यवहार में लाना, पितृसत्ता विवाह बंधन के पवित्रता, दायित्व भाव, प्रेम भाव, समानता एवं सम्मान भाव को शोषण, शासन, कुंठा पूर्ति में परिवर्तन कर चुका है. स्त्री के भरण-पोषण उसे दया लगने लगा है. बेझिझक अनेक स्त्रियों के साथ संबंध रखना उसके लिए पौरुष प्रमाण पत्र बन चुका है. पितृसत्ता के रणनीति ने विवाह जैसे सामाजिक बंधन को स्त्रियों के लिए बंदीगृह बना दिया है.
बचपन से ही सुगंधा विवाह बंधन जनित घरेलू हिंसा को न केवल माँ के साथ होते देखती है अपितु अपने आस पड़ोस की स्त्रियों को भी उस शोषण से मरते हुए देख रही थी. तब सुगंधा जीवन भर विवाह न कर अकेले रहने का प्रण लेती है. परंतु सुगंधा यौवनता की भावनाओं के विपरीत कितने दिन संघर्ष कर सकती थी आखिरी में उसके जीवन में रितिक नामक खुले विचार वाले लड़के का प्रवेश होता है. जब सुगंधा रितिक से अपने प्रेम का इजहार करती है तो रितिक इस प्रेम को अपने फायदे के लिए प्रयुक्त करता है और तर्कों के जाल में उसे फंसाते हुए सुगंधा से अत्यंत व्यंग भाव से पूछता है कि “अब तुम कहोगी कि तुम मुझसे शादी करना चाहती हो. मेरे साथ घर बसाना चाहती हो और चंद बच्चे पैदा करना चाहती हो.”4 और सुगंधा रितिक के बातों को अपने आधुनिक नारी होने के अहंकार के विरोध में लेते हुए बड़े ही दंभ से कहती है कि “यह किसने कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ ? कि तुमसे बच्चे पैदा करना चाहती हूँ ? तुम्हें पसंद करती हूँ बस, इसीलिए तुम्हारा साथ चाहती हूँ.”5 और उसी दिन रितिक ने अपना हुक्म का इक्का डाला नई पीढ़ी की नई सोच ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का, यथा “मेरे साथ रहोगी, बिना शादी किए ? लिव इन रिलेशन? रितिक ने चुनौती-सी देते हुए पूछा था और मैं रितिक के जाल में फंस गई थी। कारण मैं अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहती थी और ‘लिव-इन-रिलेशन’ वाला फंडा मुझे अपने ढंग जैसा लगा था. बिना विवाह किए किसी पुरुष के साथ पति-पत्नी के रूप में रहने की कल्पना ने मुझे रोमांचित कर दिया था. इसमें मुझे अपनी स्वतंत्रता दिखाई दी. मैं जब चाहे तब मुक्त हो सकती थी, वस्तुतः मुझे तो मुक्त ही रहना था, बंधन तो वह होता जहां किसी नियम का पालन किया जाता.”6 लिव इन रिलेशनशिप की बुनियाद ही कभी भी अलग होने के शर्त पर टीका होता है और सुगंधा के कटु अतीत के कारण वह अपने स्वाधीनता के लिए अधिक चिंतित थी, जो उसे इस आसान से अलग होने के ‘सहजीवन’ में सुरक्षित लगने लगा.
रितिक एवं सुगंधा जैसी युवा समाज की मानसिकता को स्पष्ट करने के लिए आलोचक नमिता सिंह की बात को उद्धृत करना सही मानता हूँ. यथा - “अब नौजवान लड़के-लड़कियां बिना प्रेम के साथ रह लेते हैं. दोनों अपना-अपना हित साधन कर रहे हैं. सभी तरह की जरूरतें पूरी करते हैं ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में. जरूरत खत्म हो गई अलग हो गये. प्रेम अब त्याग, समर्पण नहीं, बाजारवाद के युग में व्यवहारिक हो गया है.”7 आज की युवा पीढ़ी में संवेदना एवं प्रेम की कमी अधिक मात्रा में दिखाई दे रही है जिसके कारण समाज में प्रेम संबंधी हत्या एवं आत्महत्या के आँकड़े बढ़ते जा रहे हैं. प्रेम भावनाओं से अधिक शरीर पर केंद्रित होकर फायदा एवं नुकसान पर टिका हुआ है. आधुनिक काल में बढ़ते हुए घरेलू हिंसा एवं आत्म केंद्रित स्वभाव के कारण युवाओं के मध्य संबंधों से भागने की मनोवृति बढ़ रही है, अपने जीवन के मुक्ति के रूप में वह सामाजिक एवं मानवीय दायित्व से अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं, परन्तु बिना किसी उत्तरदायित्व के एवं संबंध में यायावरता का भाव बहुत अधिक मात्रा में बढ़ता जा रहा है. व्यक्ति विशेष के लिए यह उसके स्वार्थपूर्ति का एक आसान एवं आधुनिक माध्यम हो सकता है परंतु समाज की सामाजिक, पारिवारिक, भावनात्मक व्यवस्था में एक भारी गिरावट आने का कारण बनते जा रहा है.
रितिक जितना भी अपने आपको आधुनिक समाज का खुले विचारवाला पुरुष कहे परंतु उसके मध्य के भोगवादी मानसिकता से भरा पितृसत्ता सुगंधा का शोषण करने लगता है. इस संबंध के कारण रितिक सुगंधा के मकान में ही रहने लगा और सामाजिक रूप से इस संबंध को स्वीकार नहीं मिलने के कारण सुगंधा को बार-बार मकान बदलने एवं आस-पड़ोस के लोगों से ताना सुनना पड़ रहा था. इससे परेशान होकर दोनों ने एक बड़ा सा घर खरीद लिया जिसकी आवश्यकता सुगंधा को नहीं लगी परंतु रितिक के आदेश को वह अस्वीकार नहीं कर पाई थी, सुगंधा धीरे-धीरे रितिक की पत्नी की भूमिका में आने लगी थी, घर एवं बाहर के सभी काम धीरे-धीरे सुगंधा की ही जिम्मेदारी बनती जा रही थी. रितिक उसको मानसिक रूप से चोट पहुंचा रहा था, प्रत्येक बहस में वह बात सुगंधा के निजी जीवन पर लाकर उसके सोच को गलत दिखाने में ही लगा हुआ था “रितिक जानता है कि दिल की चोट दिमाग की चोट से भी अधिक खतरनाक होती है. इंसान की जान भी जा सकती है इस से. देह की चोट तो इंसान सह जाता है किन्तु मन पर की गई चोट को सहना बहुत कठिन होता है. लगभग असंभव.”8 रितिक पितृसत्ता के नई कूटनीति को अस्त्र बना रहा था जिससे स्त्री मानसिक रूप से इतना कमजोर हो जाए कि उसकी हर बात पर आँख मूँद कर विश्वास करे एवं अपने प्रत्येक सोच को पुरुष के दृष्टिकोण से देखने लगे. जिस स्वाधीनता, समानता, सम्मान के लिए सुगंधा ने लिव-इन-रिलेशनशिप को चुना था. उस संबंध ने न उसे पत्नी बनाया न प्रेमिका वह रितिक द्वारा एक रखी हुए स्त्री बन गई थी.
वैवाहिक बंधन से भागने का और एक महत्त्वपूर्ण कारण पति रूपी पुरुष का पत्नी रूपी स्त्री के ‘यौनिकता’ को नकारना भी है. विवाह संबंध में दैहिक संबंध भी एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है परंतु उस दैहिक में देह स्त्री का एवं इच्छा पुरुष का रहना भी एक प्रकार अनदेखे शोषण को उत्पन्न करता है. क्योंकि संभोग का सही अर्थ आज के दाम्पत्य जीवन से अलग होते जा रहा है उसी देह की स्वाधीनता, काम क्रिया की स्वाधीनता के लिए भी युवा स्त्री लिव-इन रिलेशन को महत्त्व देने लगी है. सुगंधा ने भी अपने देह की तृप्ति के लिए वही मार्ग अपनाया परंतु रितिक उस संभोग के भाव को भी अपने अनुसार ही ढाल ने की कोशिश करता रहा. “यूं तो हम दोनों होटल में ही खा कर घर लौट सकते थे किन्तु रितिक को काम-तृप्ति के बाद उदर तृप्ति अधिक पसंद थी. मैं अवचेतन में उसके अनुरूप ढलती जा रही थी, संभवतः यह स्त्री प्रकृति का स्वभाव था. स्त्री स्वयं को ढल जाने देती है पुरुष की इच्छाओं के अनुरूप.”9 लेखिका ने भारतीय स्त्री जीवन के सबसे बड़े जेनेटिक मुद्दे को उभारा है कि भारतीय परंपरा में पली बड़ी स्त्री क्या लिव-इन में रहकर भी अपने कोमलता, संबंधों के प्रति भावुकता, समर्पण भाव, एवं एकनिष्ठता को अपने दिलों दिमाग से निकाल सकती है. सुगंधा पाश्चात्य को अपनाते हुए भी अपने मध्य की भारतीयता को अलग नहीं कर पाती है.
आज की आत्मनिर्भर स्त्री के लिए एक चुनौती आर्थिक भी है जिसके कारण उनका शोषण एवं हत्या हो रहा है. सम्पूर्ण उपन्यास में सुगंधा का आर्थिक शोषण भी होता है. इस संबंध के चलते सुगंधा को ही बार-बार किराये का मकान तलाशना, सामानों को स्थानांतरण करना आदि के साथ-साथ जब रितिक बड़े से घर खरीदने को कहता है तब भी सुगंधा को अपने मर्जी के विपरीत आधा पैसा देना पड़ता है, उसके अतिरिक्त रितिक घर के खर्चे में भी अपना योगदान देना बंद कर देता है. भले ही आधुनिक समाज में स्त्री का शोषण पारंपरिक तरीके से होना कम हो गया हो परंतु शारीरिक, मानसिक, आर्थिक शोषण हो रहा है. संबंध के जिस ताजगी एवं समानता को जीवित रखने के लिए सुगंधा ने सहजीवन को चुना वह धीरे-धीरे खत्म होने लगा था. रितिक दिन भर तो सुगंधा को दबाकर रखने की कोशिश करता बात-बात पर झगड़ना, सुगंधा को दोषी बना देना, घर के किसी भी काम में सहयोग नहीं करना, घर के खर्चे में भी अपना योगदान देना बंद कर दिया था लेकिन रात आते ही रितिक एक कामुकता से भरा पुरुष बन जाता है “रात के रितिक और दिन के रितिक में जमीन-आसमान का अंतर रहता, जैसे ‘जैकल एंड हाईड’. लेकिन ठीक उल्टा संस्करण. रितिक का मूड दिन में खराब रहता लेकिन रात को बढ़िया रहता.”10 रितिक को पता था जिस संबंध में वे दोनों हैं उसका प्रथम नियम मन के अनुसार कभी भी बिना बाधा के अलग हो सकते हैं और रितिक अलग होना चाहता था. जिसके लिए वह नित नए चाले चलता परंतु सुगंधा उसको एकनिष्ठ प्रेम करने लगी थी इस कारण वह रितिक को बांध कर रखने का भरसक प्रयास करती हुई सुगंधा रितिक को संभोग के ताजगी में बाँध के रखना चाहती थी परंतु रितिक इस प्रेम को उसके चारित्रिक पतन के रूप में लेता है और कहता है कि “तुम तो मँजी हुई खिलाड़ी लगती हो. ऐसा लगता है जैसे अच्छा-खासा अभ्यास हो तुम्हें.”11 पुरुष के लिए स्त्री का प्रणय निवेदन आज के समय में चरित्रहीनता ही बन गए है. संभोग में अब समान रूप से भोग करने की प्रवृत्ति न रहकर पुरुषसत्ता का हावी होने लगा है. जिस देश ने कामसूत्र जैसे अमूल्य ग्रंथ पूरे विश्व को दिया है वहाँ स्त्री की प्रणय निवेदन उसके चारित्रिक हीनता का सूचक पुरुष सत्ता के स्वार्थी मानसिकता ने ही बनाया है.
इतने दिनों के संबंध के बाद भी रितिक सुगंधा के मन से नहीं जुड़ा था परंतु सुगंधा रितिक से सच्चा प्रेम करने लगी थी उसे सहजीवन के वास्तविकता पता होते हुए भी अपने एवं रितिक के संबंध को वह आजीवन आकलन करने लगी थी. सुगंधा अपने संबंध एवं अपने स्वभाव का विश्लेषण करते हुए कहती है कि “मैं महसूस करने लगी थी कि जिस ताजगी को बनाए रखने के लिए हमने विवाह किए बिना साथ रहने का निर्णय किया था, वह ताजगी कहीं पीछे छूटती जा रही है. हम विवाहित नहीं हैं इसलिए स्वतंत्र हैं कि वह ताजगी इतर व्यक्तियों में ढूंढ सकें. लेकिन मैं जानती हूँ कि मेरा स्त्री मन रितिक से इतर, दूसरी देह में चैन नहीं ढूंढ पाएगा. संबंधों की यायावरी स्त्री देह को भले ही नए- नकोर अनुभव दे दे स्त्री मन को चैन नहीं दे पाती है.”12 लेखिका आधुनिक स्त्री मन के वास्तविकता को पाठकों के सम्मुख रखने का एक सफल प्रयास करती हैं, इस आधुनिकता के भागम भाग जीवन में स्त्री अपने मन का ठहराव चाहती है एक ऐसा प्रेम जो उसे लाखों चुनौतियों के बीच सुकून एवं साहस दे सके, देह के स्तर एवं मन का स्तर में एक अंतर लेखिका ने स्पष्ट दिखाया है, देह की आवश्यकता एक आकर्षण मात्र से उत्पन्न एवं शारीरिक मिलन से पूर्ण हो सकती है परंतु मन एवं आत्मा की आवश्यकता जीवन भर के साथ के संबंध से ही पूर्ण होती है जिसके लिए साथी में साथ, सम्मान, प्रेम, समझदारी आदि भावों का रहना अनिवार्य है. आज के युवा पीढ़ी के संबंध में आतुरता आ गयी है उस यायावरता पर लेखिका एवं आलोचक रंजना जायसवाल लिखती हैं कि “सहजीवन को कुछ स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्रता का विजय द्वार मानती हैं. लेकिन कुछ विचारक यह मानते हैं कि वास्तव में इस रिश्ते में बिना किसी जिम्मेदारी के पुरुष स्त्री का यौन पान करता है. मकान, वस्त्र, खान-पान सभी जिम्मेदारियों से मुक्त पुरुष इस रिश्ते में वास्तव में विजेता होता है. शादी करते ही स्त्री पुरुष की आधी संपत्ति की वारिस हो जाती है, उसका मकान, रहन-सहन, पहनावा सभी कुछ पुरुष की जिम्मेदारी होती है. पूरे समाज में इज्जत और सुरक्षा भी मिलती है. लेकिन लिव इन रिलेशन में स्त्री बस खोटी ही है.”13 इस कथन से सार तत्व यह है कि लिव-इन-रिलेशनशिप को विवाह के विकल्प में स्त्री अपने स्वाधीनता के रूप में चुनाव करना उसको अधिक शोषण के गर्त में धकेल देती है.
रितिक के साथ संबंध विच्छेद का जो प्रसंग था लेखिका ने रितिक के मुख से जो अपशब्द कहलवाएं है वह आज के समय की वास्तविकता का कटु चित्र है. संबंध बनाने के लिए पुरुष बड़े उत्साहित होकर आगे तो बढ़ जाते हैं परंतु उनका दैहिक प्रेम का अंत स्त्री को दोषी एवं चरित्रहीन बनाकर ही खत्म होता है. रितिक अपने अंतर की बात को ही कहता है कि “उफ! तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? मेरे सोचने की छोड़ो. अगर तुम सचमुच किसी के साथ चक्कर चला भी लोगी तो मैं तुम्हें रोक तो नहीं सकता. क्यों नहीं रोक सकते? रोका बीवी को जा सकता है, रखैल....”14 जिस स्वाधीनता के लिए सुगंधा ने लिव-इन-रिलेशन को अपनाया था उसका पहल तो रितिक ने ही किया था, अपने आपको आधुनिक कह देने से कोई आधुनिकता का अंश नहीं बन जाता, आधुनिकता के नाम पर रितिक जैसे पितृसत्ता के उत्तराधिकारी लिव-इन-रिलेशन को अपने अय्याशी का माध्यम ही मानते है.
स्वाधीनता के नाम पर स्त्री अपने जीवन को और अधिक जटिल बना दे रही है. इसका भी उदाहरण सुगंधा के माध्यम से दिया गया है. रितिक से विच्छेद के पश्चात ऋषभ नामक विवाहित व्यक्ति से सिर्फ देह के स्तर पर रिश्ता बना लेती है. वह ऋषभ को पूर्व प्रेम रितिक के संबंध में जब बताती है तब ऋषभ उसे कहता है कि “चलो, अच्छा हुआ जो तुमने मुझे अपने बारे में बता दिया. अब मुझे तुम्हें ले कर कोई अपराध बोध नहीं होगा. ऋषभ ने चैन की सांस लेते हुए कहा था. क्या मतलब? मतलब ये कि तुम स्वयं स्वतंत्र रहने की पक्षधर हो.. और तुम मेरे स्थान पर बहुत जल्दी ही दूसरा पुरुष ढूंढ लोगी.”15 ऋषभ के बाद उसके जीवन में विशाल से जुड़ती है जिस संबंध का कोई निर्दिष्ट परिणाम लेखिका बिना दिखाए पाठकों के मानसिकता पर ही छोड़ देते हैं. रितिक सुगंधा से अलग होकर विवाह कर लेता है, सुगंधा के बाकी प्रेमी भी विवाहित हैं, सामाजिक रूप से देखा जाए तो इस उपन्यास में सुगंधा के जीवन में आए पुरुष पात्र पारिवारिक रूप से एक स्थायित्व को अपनाते हैं. उसके साथ-साथ अपने स्वार्थ सिद्धि का माध्यम सुगंधा को बनाते है. सम्पूर्ण उपन्यास में स्वाधीनता, आधुनिकता एवं फेमिनिज़्म के नाम पर सुगंधा ही छली जाती है.
लेखिका ने इस उपन्यास के आरंभ में स्त्री को ही अपने अधिकारों की जिम्मेदारी देते हुए कहा है कि “स्त्री क्या चाहती है? यह प्रश्न हर युग में सभी के मानस पटल पर उपस्थित रहती है. पुरुष इस प्रश्न का उत्तर ढूंढते रहते हैं और स्वयं स्त्री भी. मुझे लगता है कि पुरुषों से कहीं अधिक आवश्यकता है स्त्री के लिए इस प्रश्न का उत्तर. जब तक वह स्वयं नहीं जानेंगी, समझेंगी कि उन्हें क्या चाहिए तो वे अपने अस्तित्व की अलग पहचान कैसे कर सकेंगी?”16 सुगंधा जैसी शिक्षित, आत्मनिर्भर लड़की ने अपने जीवन को दिशा देने के लिए स्वाधीनता के एक ही पक्ष लिया वह है देह की स्वाधीनता, उसने इसी स्वाधीनता के कारण एक देह से दूसरे देह तक भटकना उसे भावनात्मक स्तर पर पुरुष जैसे ही बनाने लगा था, उसे एक समय में इस प्रकार संबंध की आवश्यकता पड़ने लगी, परंतु भारतीय स्त्री विमर्श का अर्थ पुरुष जैसे बनना कहीं भी उल्लेख नहीं है. स्वाधीनता के आस में सुगंधा ने विवाह संस्थान को ठुकरा कर भी शोषण, असम्मान , चारित्रिक विश्लेषण, हीन दृष्टि से नहीं बच पाई. विवाह न करने का निर्णय स्त्री के स्वाधीनता के पक्ष में हो सकता है परंतु उसके विकल्प में लिव-इन-रिलेशन को लेना उसे और अधिक पराधीन एवं एक उपभोग की वस्तु बनाता जा रहा है.
संदर्भ :
1. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 9
2. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 13
3. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 13
4. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 30
5. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 31
6. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 31
7. स्त्री-प्रश्न- नमिता सिंह, पृ. सं. 213
8. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 13
9. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 76
10. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 153
11. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 153
12. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 148
13. रंजना जायसवाल, तुम करो तो पुण्य हम करे तो पाप, पृ. सं. 66
14. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 150
15. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 177
16. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, पृ.सं. 7
संदर्भ ग्रंथ - सूची :
1. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, सामयिक प्रकशन, नई दिल्ली, 2017.
2. स्त्री-प्रश्न- नमिता सिंह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017.
3. रंजना जायसवाल, तुम करो तो पुण्य हम करे तो पाप, नयी किताब प्रकाशन, नई दिल्ली 2018.