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“कबीर के दृष्टिकोण में गुरु”
“ कबीर के दृष्टिकोण में गुरु ” प्रो. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू पूर्णकुंम्भ – साहित्यिक मासिक पत्रिका मई - 2002 भक्तिकालीन सभी सन्तों में से कबीर की वाणी सबसे अधिक सशक्त एवं सक्षम है. कबीर ने तत्कालीन समस्त धर्म साधनाओं, उपासना- पद्धतियों साधना प्रणालियों आदि का गहन अध्ययन करके अपने विचार प्रकट किए हैं. साथ ही वे उच्चकोटि के साधक भी रहे हैं. कबीर का साहित्य जन-जीवन को उन्नत बनानेवाला है, मानवता का पोषक है, विश्व बन्धुत्व की भावना को जाग्रत करनेवाला है. कबीर की साधना में “ गुरु ” को अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया है. कबीर की दृष्टि में गुरु “ गोविन्द ” से भी बढ़कर है, क्योंकि “ हरि रुँठे गुरु ठौर है, गुरु रुँठे नहिं ठौर ” कहकर कबीर ने गुरु को सबसे बडा आश...
संशय की एक रात और युगीन संदर्भ
yogyatha International Research Jo urnal ISSN : 2348-4225 October - December 2014 संशय की एक रात और यु गीन संदर्भ प्रो. एस.वी.एस.एस.नारायण राजू नरेश मेहता की “ संशय की एक रात ” नई कविता की विशिष्ट कृति है . यह भी कहा जा सकता है कि “ संशय की एक रात ” जैसी कृतियों ने नई कविता के कथ्य को प्रबंधात्मक शिल्प के सहारे संप्रेषित करके व्यापक दृश्य फलक प्रदान किया . कवि ने मिथक के सहारे समकालीन परिवेश के आधुनिक बोध को उभारा है . कवि ने इतिहास और पुराण में पुनरुत्थानवादी कवियों की भाँति सांस्कृतिक गौरव की खोज नहीं की , बल्कि पुरानी कथा में ‘ वस्तु ’ नवीनता लाने उसके माध्यम से युग की जटिल स्थितियों को परिभाषित करने का उपक्रम किया है. इस काव्य का प्रकाशन सन् 1962 में हुआ है. “ संशय की एक रात ” का कथानक राम कथा के उस अंश से संबंधित है जिस में लंका-युध्द की तैयारी में सेतु-बंध बनवा चुके हैं और उसका कथ्य है युध्द की समस्या और उससे संबंधित प्रश्नों पर चि...