Sursagar, Gokul leela 62, आनंदै आनंद बढ्यो अति। देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति। सूरदास
Sursagar, Gokul leela 62, आनंदै आनंद बढ्यो अति। देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति। सूरदास.
आचार्य. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू
प्रसंग
भक्तिकाल
के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद में भगवान
श्रीकृष्ण के जन्म (प्राकट्य) के अवसर का अत्यंत हर्षोल्लासपूर्ण वर्णन किया गया
है. जब कंस के अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी, देवता और समस्त प्राणी भगवान विष्णु से रक्षा की
प्रार्थना करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा में देवकी और
वसुदेव के पुत्र के रूप में अवतरित होते हैं. उनके जन्म का समाचार सुनकर सम्पूर्ण
सृष्टि आनंदमग्न हो उठती है. देवता, गंधर्व, किन्नर, विद्याधर, ऋषि-मुनि
तथा समस्त देवांगनाएँ उत्सव मनाने लगती हैं. इस अलौकिक और दिव्य वातावरण का अत्यंत
भावपूर्ण चित्रण किस प्रकार किया है, कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की
व्याख्या अब देखेंगे.
पद
आनंदै
आनंद बढ्यो अति ।
देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे
जादवपति ।
विद्याधर-किन्नर कलोल मन उपजावत मिली कंठ अमित गति ।
गावत गुन गंधर्व पुलकि तन नाचतिं सब सुर-नारि रसिक अति ।
बरषत सुमन सुदेस सुर सुर, जय-जयकार करत मानत
रति ।
सिव-बिरंचि-इन्द्रादि अमर मुनि, फूले सुख न
समात मुदित मति।62।
शब्दार्थ
आनंदै - आनंद से
बढ्यो
अति – अत्यधिक बढ गया
देवनि –
देवताओं ने
दिवि - आकेश में
दुंदभी - दुंदभि, नगाड़ा
जादव पति
– यादवों के स्वामी, श्रीकृष्ण
विद्याधर
– दिव्य विद्याओं के ज्ञाता, देवगण
कलोल
- उल्लासपूर्ण गान, हर्षोल्लास
मिली कंठ
- मिलकर, सामूहिक स्वर में
अमित
गति - निरंतर, असीम रुप से
गावत गुण
– गुणों का गान करते हुए,
गंधर्व
और किन्नर – ऊर्ध्व लोकों के गायक
पुलिक तन
– रोमांचित शरीर
सुर-नारि
– देवांगनाएँ
रसिक –
प्रेम और आनंद में डूबी हुई
बरषत सुमन
- पुष्पों की वर्षा करते हुए
सुदेश शुभ दिशा, चारों ओर
जय-जयकार
– विजय घोष
रति - प्रेम, अनुराग
सिव – भगवान
शिव
बिरंचि - ब्रह्मा
इंद्रादि
– इंद्र आदि देवता
अमर - देव गण
मुदित मति
- प्रसन्न चित्त
व्याख्या
आनंदै
आनंद बढ्यो अति .
देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे
जादवपति .
कवि सूरदास इस पद
में भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण की दिव्य महिमा का अत्यंत मनोहारी वर्णन करते हैं.
जैसे ही मथुरा में श्रीकृष्ण के जन्म का समाचार फैला, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आनंद
से भर गया. ऐसा प्रतीत हुआ मानो सृष्टि के प्रत्येक कण में हर्ष की लहर दौड़ गई हो.
कवि कहते हैं कि आनंद इतना अधिक बढ़ गया कि उसका कोई पारावार नहीं रहा.
भगवान के
प्राकट्य का समाचार सुनकर देवताओं ने स्वर्ग लोक में दुंदुभियाँ बजानी आरम्भ कर
दीं. यह दुंदुभि-नाद केवल उत्सव का संकेत नहीं था, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश की
घोषणा भी थी. वर्षों से अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी को अब मुक्ति मिलने वाली थी,
इसलिए देवताओं का यह उत्सव स्वाभाविक था.
विद्याधर-किन्नर
कलोल मन उपजावत मिली कंठ अमित गति .
गावत गुन गंधर्व पुलकि तन नाचतिं सब सुर-नारि रसिक अति .
इसके बाद कवि सूरदास
जी विद्याधरों और किन्नरों का चित्र प्रस्तुत करते हैं. वे सब मिलकर मधुर स्वरों
में गान करने लगे. उनका सामूहिक संगीत ऐसा था कि जो भी उसे सुनता, उसके हृदय में आनंद और
उल्लास का संचार हो जाता. यहाँ कवि ने दिव्य संगीत के माध्यम से वातावरण की
अलौकिकता को व्यक्त किया है.
गंधर्व गण
भगवान के गुणों का गान करते हुए रोमांचित हो उठे. उनके शरीर पुलकित हो गए और वे
भक्ति-भाव में डूबकर श्रीकृष्ण की महिमा का कीर्तन करने लगे. दूसरी ओर देवांगनाएँ
प्रेम और आनंद से भरकर नृत्य करने लगीं. उनका नृत्य केवल कलात्मक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि ईश्वर के प्रति
उनके प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति था.
बरषत
सुमन सुदेस सुर सुर, जय-जयकार करत मानत रति .
सिव-बिरंचि-इन्द्रादि अमर मुनि, फूले सुख न
समात मुदित मति ..
देवता
चारों ओर से पुष्प वर्षा करने लगे. भारतीय संस्कृति में पुष्प वर्षा शुभ अवसरों पर
सम्मान और हर्ष व्यक्त करने का प्रतीक है. देवताओं की यह पुष्प वृष्टि इस बात का
संकेत है कि स्वयं स्वर्ग लोक भी श्रीकृष्ण के अवतरण पर उत्सव मना रहा था. साथ ही
वे सभी जय-जयकार कर भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम प्रकट कर रहे थे.
सूरदास
जी आगे बताते हैं कि भगवान शिव, ब्रह्मा, इन्द्र तथा अन्य सभी देवता और ऋषि-मुनि भी
इस शुभ अवसर पर अत्यंत प्रसन्न थे. उनके मन और बुद्धि आनंद से भर गए थे. वे इतने
अधिक हर्षित थे कि उनकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था. ऐसा लगता था मानो उनकी
वर्षों की प्रतीक्षा आज पूर्ण हो गई हो.
इस
प्रकार श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक बालक का जन्म नहीं था, बल्कि धर्म, सत्य, न्याय और प्रेम के नए युग का प्रारंभ था.
इसलिए सम्पूर्ण चराचर जगत में आनंद की बाढ़ आ गई और हर ओर उत्सव का वातावरण बन गया.
सूरदास ने इस दृश्य को अत्यंत जीवंत, भावपूर्ण और भक्तिपूर्ण
शैली में प्रस्तुत किया है.
विशेषताएँ
1. श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का अत्यंत मनोरम और
भव्य चित्रण, भगवान के अवतरण पर सम्पूर्ण सृष्टि के आनंद का वर्णन के साथ - साथ भक्ति, प्रेम और उत्सव की भावना
का उत्कृष्ट प्रस्तुतीकरण किया है.
2. भक्ति भाव की प्रधानता, वात्सल्य एवं
माधुर्य भाव की अभिव्यक्ति और ईश्वर के अवतरण के प्रति श्रद्धा, उल्लास और समर्पण का
चित्रण किया है.
3. दृश्यात्मकता और चित्रात्मकता का सुंदर
प्रयोग, संगीत, नृत्य
और पुष्पवर्षा के माध्यम से उत्सवमय वातावरण की सृष्टि किया गया है.
4. “आनंदै आनंद” में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है.
5. “जय-जयकार”, “गावत गुन गंधर्व” आदि में अनुप्रास अलंकार है.
6. “फूले सुख न समात” में अतिशयोक्ति
अलंकार है.
7. ब्रजभाषा का मधुर, सरल, सरस और भावानुकूल भाषा का
प्रयोग किया गया है.
8. साहित्यिक रूप एवं गेयता और संगीतात्मकता
से युक्त शैली का प्रयोग किया गया है.
9. यह पद सूरदास की कृष्णभक्ति, कल्पनाशीलता और
काव्य-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है.
10. इसमें
श्रीकृष्ण जन्म के सार्वभौमिक महत्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया
है.
11. इस पद
भक्ति-साहित्य में कृष्णावतार की महिमा का अनुपम चित्र प्रस्तुत करता है.
12. इस
पद में सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के अवसर पर सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त
दिव्य आनंद, उल्लास
और उत्सव का अत्यंत सजीव एवं हृदयग्राही चित्रण किया है. देवताओं की दुंदुभियाँ,
गंधर्वों का गान, किन्नरों का उल्लास, देवांगनाओं का नृत्य और पुष्प वर्षा —इन सबके माध्यम से सुरदास जी ने यह
स्थापित किया है कि श्रीकृष्ण का अवतरण केवल मथुरा की घटना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याण और धर्म की पुनर्स्थापना का महापर्व है.