Sursagar, Gokul leela 68, जसोदा हरि पालनैं झुलावै । हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै। सूरदास

 

Sursagar, Gokul leela 68, जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै। सूरदास

आचार्य. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू.


प्रसंग

भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद कृष्ण की बाल-लीलाओं से संबंधित है. इसमें माता यशोदा के वात्सल्य भाव का अत्यंत मार्मिक एवं सजीव चित्रण किया गया है. माता यशोदा अपने नन्हे बालक कृष्ण को पालने में झुलाकर सुलाने का प्रयास कर रही हैं. वे लोरी गाती हैं, उसे दुलारती हैं और स्वयं नींद को बुलाकर अपने लाल को सुलाने का आग्रह करती हैं. इस पद में कवि ने मातृत्व के सहज, स्वाभाविक और मधुर भावों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है. साथ ही यह भी दिखाया है कि जिस परम ब्रह्म को देवता और ऋषि-मुनि भी प्राप्त नहीं कर सकते, वही भगवान कृष्ण माता यशोदा की गोद में किस प्रकार खेल रहे हैं, कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या अब देखेंगे.

पद

जसोदा हरि पालनैं झुलावै ।
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै ।
मेरे लाल कौं आउ निदँरिया, काहैं न आनि सुवावै ।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै ।
कबहुँक पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै ।
सोवत जानि मौन है कै रहि, करि करि सैन बतावै ।
इहिं अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै ।
जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नँद भामिनि पावै ।68

शब्दार्थ

जसोदा  - यशोदा

पालनैं  - पालने में

झुलावै – झुलाती है

हलरावै  - हिलाती है, झोटा देती है

दुलराइ  - प्यार करती हुई

मल्हावै  - चूमती और सहलाती है

जोइ-सोइ – जो कुछ भी

निदँरिया  - नींद

सुवावै  -  सुलाए

बेगहिं – शीघ्र, जल्दी

कान्ह  -  श्रीकृष्ण

अधर  - होंठ

फरकावै  - फडफडाते हैं

मौन है कै  - चुप होकर

सैन  - संकेत

इहिं अंतर  - इसी बीच

अकुलाई  - बेचैन होकर

जसुमति  - यशोदा

मधुरैं  - मधुर स्वर में

अमर  - देवता

दुरलभ  - कठिनता से प्राप्त होनेवाला

नँद भामिनि  - नंद की पत्नी यशोदा

व्याख्या

जसोदा हरि पालनैं झुलावै .
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै .
कवि सूरदास इस पद में माता यशोदा के वात्सल्य-भाव का अत्यंत मनोहर चित्रण करते हैं. वे बताते हैं कि माता यशोदा अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण को पालने में झुला रही हैं. कभी वे पालने को धीरे-धीरे हिलाती हैं, कभी प्रेमपूर्वक बालक को दुलारती हैं और कभी उसके मुख का चुम्बन लेकर उसे स्नेह से सहलाती हैं. बालक को सुलाने के लिए वे लोरी गा रही हैं. उनके मुख से जो भी मधुर शब्द निकलते हैं, वे उसी को गुनगुनाने लगती हैं.

मेरे लाल कौं आउ निदँरिया, काहैं न आनि सुवावै .
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै .
लोरी गाते हुए यशोदा नींद को संबोधित करती हैं. वे कहती हैं—"अरी नींद! मेरे प्यारे लाल के पास आ जा और उसे सुला दे. तू इतनी देर क्यों कर रही है? देख, मेरा कन्हैया तुझे बुला रहा है. अब तो शीघ्र आकर उसे अपनी गोद में सुला ले." यहाँ कवि ने नींद का मानवीकरण करते हुए उसे एक जीवित पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे माता यशोदा बातचीत कर रही हैं.

कबहुँक पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै .
सोवत जानि मौन है कै रहि, करि करि सैन बतावै .
यशोदा की मधुर लोरी सुनकर बालक कृष्ण अपनी बाल-लीला दिखाते हैं. कभी वे अपनी आँखें बंद कर लेते हैं मानो सो गए हों, और कभी अपने होंठ फड़फड़ाने लगते हैं. यह दृश्य किसी सामान्य शिशु के समान प्रतीत होता है. भगवान स्वयं बालरूप में ऐसी लीलाएँ कर रहे हैं कि माता यशोदा उन्हें एक साधारण बालक समझकर आनंदित हो रही हैं.

जब यशोदा को लगता है कि कृष्ण सो गए हैं, तब वे स्वयं चुप हो जाती हैं. इतना ही नहीं, वे आसपास के लोगों को भी संकेत करके चुप रहने का आग्रह करती हैं ताकि बालक की नींद न टूट जाए. यह एक माँ की स्वाभाविक चिंता है. वह चाहती है कि उसका बच्चा चैन से सोता रहे और किसी प्रकार का शोर उसे परेशान न करे.

इहिं अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै .
जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नँद भामिनि पावै ..

किन्तु उसी समय श्रीकृष्ण फिर से जाग उठते हैं. वे बेचैन होकर आँखें खोल देते हैं. अपने लाल को जागा हुआ देखकर माता यशोदा पुनः मधुर स्वर में लोरी गाने लगती हैं और उसे फिर से सुलाने का प्रयास करती हैं. यह दृश्य मातृत्व की सहजता, स्नेह और धैर्य का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है.

अंत में कवि सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा जिस वात्सल्य-सुख का अनुभव कर रही हैं, वह अत्यंत दुर्लभ है. जिस परमात्मा के दर्शन के लिए देवता, ऋषि और मुनि तपस्या करते हैं, वही भगवान कृष्ण यशोदा की गोद में खेल रहे हैं, उनके द्वारा झुलाए जा रहे हैं और उनकी लोरी सुनकर सो रहे हैं. यह सुख देवताओं और महर्षियों को भी सुलभ नहीं है. केवल नन्द की पत्नी यशोदा ही इस अनुपम आनंद की अधिकारी बनी हैं.

इस प्रकार कवि ने यह सिद्ध किया है कि भक्ति और प्रेम के सामने ईश्वर भी बंध जाते हैं. यशोदा का मातृप्रेम इतना महान है कि स्वयं भगवान भी उसके अधीन होकर बालक की भाँति व्यवहार करते हैं.

विशेषताएँ


  ब1.बालकृष्ण की वात्सल्य-लीला का अत्यंत सजीव चित्रण, माता यशोदा के मातृ-स्नेह का स्वाभाविक एवं मार्मिक प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ ईश्वर के मानवीय रूप का सुंदर चित्रण किया है.

22.पूरे पद में वात्सल्य रस का अत्यंत सुंदर और परिपक्व रूप दिखाई देता है. माता यशोदा का प्रेम, दुलार, चिंता और ममता पाठक के हृदय को स्पर्श करती है.

33. कवि ने यह दिखाया है कि प्रेम और भक्ति के वशीभूत होकर भगवान स्वयं बालक बन जाते हैं.

44.लोरी, झूला, चुम्बन, संकेत और बालक की चेष्टाएँ पूरे पद को मधुरता से भर देती हैं.

55."मेरे लाल कौं आउ निदँरिया" में मानवीकरण अलंकार है,
यहाँ नींद को मानवीय रूप देकर उससे संवाद किया गया है.

66."हलरावै, दुलराइ", "मधुरैं गावै" आदि में ध्वनियों की पुनरावृत्ति में अनुप्रास अलंकार है.

77."जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ", देवताओं और मुनियों के लिए भी उस सुख को दुर्लभ बताना अतिशयोक्ति अलंकार का सुंदर उदाहरण है.

88. यह पद सूरदास की वात्सल्य-वर्णन कला का श्रेष्ठ उदाहरण है.

99. बाल मनोविज्ञान और मातृत्व की भावनाओं का अत्यंत यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करता है.

10. कृष्णभक्ति साहित्य में यह पद विशेष स्थान रखता है.

11. इसमें भक्त और भगवान के मधुर संबंध का अद्भुत रूप देखने को मिलता है.

12. माता यशोदा द्वारा कृष्ण को झुलाना, लोरी गाना, संकेत करना तथा कृष्ण का आँखें मूँदना आदि दृश्य अत्यंत सजीव बन पड़े हैं.

13. बालक और माता के व्यवहार का यथार्थ एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण किया गया है.

14. कृष्ण का सोने का अभिनय करना और फिर अचानक जाग उठना पद में रोचकता उत्पन्न करता है.

15. ब्रजभाषा का अत्यंत मधुर, सरल, सहज और भावानुकूल शब्दावली से युक्त साहित्यिक रूप का प्रयोग किया है.

16. गीतात्मक एवं गेय शैली तथा लोकजीवन से जुड़े शब्दों का सुंदर प्रयोग किया है.

17. प्रस्तुत पद में सूरदास ने माता यशोदा और बालक कृष्ण के मधुर संबंध का अत्यंत हृदयस्पर्शी चित्रण किया है. यशोदा का वात्सल्य, उनकी लोरी, उनकी चिंता तथा बालक कृष्ण की मोहक चेष्टाएँ पाठक को भाव-विभोर कर देती हैं. कवि सूरदास जी यह संदेश देते हैं कि प्रेम और भक्ति की शक्ति इतनी महान है कि स्वयं परमब्रह्म भी उसके अधीन होकर एक साधारण बालक की भाँति व्यवहार करने लगते हैं. यही कारण है कि यशोदा को प्राप्त यह वात्सल्य-सुख देवताओं और ऋषि-मुनियों के लिए भी दुर्लभ माना गया है.


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