Andal’s Call to Universal Bhakti, Tiruppavai, Pashuram 2, Sri Andal, वैयत्तु वाळ्’वीर्गाळ् नामुं नं पावैक्कु, शेय्युं किरिशैगळ् केळीरो, पार्कडलुळ्, आचार्य एस वी एस एस नारायण राजू

 

Andal’s Call to Universal Bhakti, 

Tiruppavai, Pashuram 2, Sri Andal,

 वैयत्तु वाळ्’वीर्गाळ् नामुं नं पावैक्कु, शेय्युं किरिशैगळ् केळीरो, पार्कडलुळ्, 

आचार्य एस वी एस एस नारायण राजू.


Tiruppavai, Pashuram 2 Composed by Sri Andal, Presented and Explained by

 Prof. S. V. S. S. Narayana Raju.

Namaste. A warm welcome to “Prof S V S S Narayana Raju”, a channel dedicated to language, literature, Indian knowledge traditions, and spiritual wisdom.

This video presents an insightful exploration of Thiruppavai-Pāsuram 02, “Vaiyathu Vāzhvīrgaḷ Nāmuṃ Nam Pāvai,” composed by the great Vaiṣṇava woman saint Śrī Āṇḍāl (Kodhai) one of the most luminous and beloved voices of the Indian Bhakti tradition. Across the vast spiritual landscape of India, women mystic-poets have endowed Bhakti with profound emotional depth and transformative spiritual power. In North India, Rādhā embodies the soul’s eternal love for the Divine, while Mīrā Bāī’s fearless and unwavering devotion to Lord Kṛṣṇa continues to inspire generations through its intensity, surrender, and longing. In South India, this sacred lineage finds its most disciplined, poetic, and community-oriented expression in Śrī Āṇḍāl. Through the thirty pāsurams of the Thiruppavai, Āṇḍāl elevates poetry into collective spiritual practice, where Bhakti becomes a shared sādhana grounded in purity, restraint, moral discipline, and complete śaraṇāgati (total surrender).

Today, we turn to the second Pāsuram of the Thiruppavai, “Vaiyathu Vāzhvīrgaḷ,” composed by Śrī Āṇḍāl, also known as Kodhai, the only woman among the twelve Āḻvārs. Across India’s Bhakti traditions, Rādhā embodies the soul’s longing for Kṛṣṇa, and Mīrā Bāī gives voice to fearless devotion. In the Thiruppavai, Āṇḍāl invites us to experience devotion as something we practise together.

The verse opens with a generous call, “Vaiyathu Vāzhvīrgaḷ” - “O people of the world!” Having called her companions together in the first Pāsuram, Āṇḍāl now tells them how they will observe the sacred Pāvai-vrata. They will bathe at dawn and sing in praise of the feet of the Lord who rests upon the Ocean of Milk. They will give up milk, ghee, and adornments for the duration of the observance, guard their speech, and give generously to those in need.

Notice how naturally Āṇḍāl places generosity alongside self-restraint. The same verse that asks us to simplify our own lives also asks us to pay attention to the needs of others. In this way, devotion finds expression in what we sing, how we speak, and what we give.

Let us now listen to this beautiful Tamil verse and explore how Āṇḍāl brings prayer, discipline, and compassion together in a shared path of surrender to the Divine.

Let us immerse ourselves in the divine message of Sri Aandal and discover how true love becomes the pathway to spiritual excellence and universal harmony.

Thank you for watching. Please Like, Share, Subscribe, and support our channel for more insightful lectures on Hindi literature, Thiruppavai, Indian culture, and spiritual philosophy.

दक्षिण भारत की अमूल्य भक्ति-परंपरा की तेजस्वी ज्योति माता श्री आंडाल द्वारा रचित अमृतमयी तिरुप्पावै गीतों की व्याख्यान-श्रृंखला में आज  मैं द्वितीय पासुरम की व्याख्या करने जा रहा हूँ.

तमिल मूल पाठ

வையத்து வாழ்வீர்காள்! நாமும் நம் பாவைக்குச்
செய்யும் கிரிசைகள் கேளீரோ; பாற்கடலுள்
பையத் துயின்ற பரமன் அடி பாடி,
நெய்யுண்ணோம், பாலுண்ணோம், நாட்காலே நீராடி,
மையிட்டு எழுதோம், மலரிட்டு நாம் முடியோம்,
செய்யாதன செய்யோம், தீக்குறளை சென்று ஓதோம்,
ஐயமும் பிச்சையும் ஆந்தனையும் கைகாட்டி,
உய்யுமாறு எண்ணி உகந்து — ஏலோர் எம்பாவாய்.

हिंदी लिप्यंतरण

वैयत्तु वाळ्’वीर्गाळ् नामुं नं पावैक्कु,
शेय्युं किरिशैगळ् केळीरो, पार्कडलुळ्
पैय त्तुयिन्र परम अडिपाडि,
नेय्युण्णों पालुण्णों नाट्काले नीराडि,
मैयिट्टेळु’तों मलरिट्टु नां मुडियोम्,
शेय्यादन शेय्यों तीक्कुरळै चेन्रोदोम्,
ऐयमुं पिच्चैयुमान्दनैयुं कैकाट्टि,
उय्युमारेण्णि उगन्देलोरेम्बावाय् ॥ २ ॥

शब्दार्थ-सारणी (तमिल → लिप्यंतरण → हिंदी अर्थ)

तमिल

लिप्यंतरण

हिंदी अर्थ

வையத்து வாழ்வீர்காள்

वैयत्तु वाळ्’वीर्गाळ्

हे पृथ्वी पर रहनेवाली सखियो!

நாமும் நம் பாவைக்குச்

नामुं नं पावैक्कु

हम भी अपने ‘पावै-व्रत’ के लिए

செய்யும் கிரிசைகள் கேளீரோ

शेय्युं किरिशैगळ् केळीरो

जो नियम करने हैं, सुनो

பாற்கடலுள்

पार्कडलुळ्

क्षीर-सागर में

பையத் துயின்ற பரமன்

पैय त्तुयिन्र परम

योगनिद्रा में स्थित परमात्मा

அடி பாடி

अडिपाडि,

उनके चरणों का कीर्तन करते हुए

நெய் உண்ணோம், பால் உண்ணோம்

नेय्युण्णों पालुण्णों

घी नहीं खाएँगे, दूध नहीं पिएँगे

நாட்காலே நீராடி

नाट्काले नीराडि

भोर में स्नान करेंगे

மையிட்டு எழுதோம்

मैयिट्टेळु’तों

आँखों में काजल नहीं लगाएँगे

மலரிட்டு நாம் முடியோம்

मलरिट्टु नां मुडियोम्

केशों में फूल नहीं सजाएँगे

செய்யாதன செய்யோம்

शेय्यादन शेय्यों

निषिद्ध कर्म नहीं करेंगे

தீக்குறளை சென்று ஓதோம்

तीक्कुरळै चेन्रोदोम्

कटु या अपशब्द नहीं बोलेंगे

ஐயமும் பிச்சையும் ஆந்தனையும் கைகாட்டி

ऐयमुं पिच्चैयुमान्दनैयुं कैकाट्टि

दान, भिक्षा और अन्न-वितरण करेंगे

உய்யுமாறு எண்ணி உகந்து

उय्युमारेण्णि उगन्दे

उद्धार के मार्ग का विचार कर आनन्दित रहेंगे

ஏலோர் எம்பாவாய்

लोरेम्बावाय्

हे सखियो! (भक्ति का सामूहिक संबोधन)

भावार्थ

माता आंडाल अपनी सहेलियों को संबोधित कर कहती हैं कि- “हे सखियो! हमारे इस पावै-व्रत के नियम सुनो. हम क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित परमात्मा श्रीमन्नारायण के चरणों का कीर्तन करेंगी. इस व्रत के दौरान हम घी या दूध नहीं लेंगे, प्रातः-स्नान करेंगे, शृंगार नहीं करेंगे, न काजल लगाएंगे, न बालों में फूल सजाएँगे. निषिद्ध कर्मों से बचेंगे, कठोर या अपशब्द नहीं बोलेंगे. दीन-दुखियों को अन्न, भिक्षा और सहायता करेंगे और अपने उद्धार का मार्ग हर्षपूर्वक अपनाएँगे. आओ, हम सब मिलकर इस पवित्र अनुशासन को निभाएँ.”

विस्तृत भावार्थ

संयम का आरम्भ
पहले पाशुरम् में माता आंडाल ने सबको भक्ति के लिए आह्वान किया, अब दूसरे पाशुरम् में वह अनुशासन की रूपरेखा बताती हैं. क्या करना है और क्या नहीं करना है. यह भक्ति का आचार-संहिता है.

अनुशासन + करुणा = भक्ति. यहाँ माता आंडाल बताती हैं कि भक्ति केवल भाव नहीं, बल्कि अनुशासित जीवन पध्दति है.
वह कहती हैं कि- “हम भोजन और शृंगार में संयम रखेंगे.”
यह त्याग दमन नहीं, बल्कि ध्यान और शुद्धि का पवित्र मार्ग है. संयम से ही मन भगवान श्रीमन्नारायण जी की ओर स्थिर होता है.

वाणी-संयम और व्यवहार-संयम
“तीकुरलै चेन्रो ओधोम्” - हम कटु वचन नहीं बोलेंगे. यह संकेत है कि सत्संग, संवाद और शुद्ध वाणी भक्ति की अत्यंत आवश्यक शर्तें हैं. अपशब्द, निंदा और व्यर्थ वार्ता मन को विक्षेपित करती हैं.

दान और सेवा का महत्व
“अय्यमुम, पिच्छैयुम, आन्दनैयुम”- अर्थात् जरूरतमंदों को दान देना, संतों और संन्यासियों की सेवा करना.
वैष्णव भक्ति में “सर्व प्राणी सेवा ही माधव सेवा” सर्वोच्च साधना मानी गई है.
यह व्रत केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण से जुड़ा है.

उद्धार का मार्ग – “उय्युम आऱु” इसका तात्पर्य यह है कि- आत्मा का परमात्मा से पुनर्मिलन, संसारिक बंधनों से मुक्ति और ईश्वर के निकट जाना. संयम, कीर्तन और सेवा से यह मार्ग प्रकाशित होता है.

विशेषार्थ एवं आचार्य परंपरा का संकेत

गुरु और शास्त्र का अनुसरण: माता आंडाल का संकेत है कि- व्रत का पालन शास्त्रीय मर्यादा के भीतर होना चाहिए.
“विधि और निषेध” -  यही शास्त्र का सार है. जो “क्या करें” और “क्या न करें” को जानता है, वही सच्चा साधक है.

गुरु की भूमिका:
गुरु ही वह सेतु हैं जो जीव और ईश्वर के बीच मार्ग बनाते हैं. इसीलिए कहा गया है कि -

“गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय;
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय.” (कबीर)

श्रीहरि के स्वरूप का स्मरण:

“पार्कडलुल पैयत्तुयिन्रा परमन” - क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में स्थित श्रीमन्नारायण. वही अब आयरपाड़ी में श्रीकृष्ण रूप में अवतरित हैं. माता आंडाल का मन उस योगनिद्रा से जागते हुए श्रीहरि को स्मरण कर रहा है.

समकालीन प्रासंगिकता

आधुनिक समानता        -          पाशुरम् का तात्पर्य

Digital Discipline       -  जैसे हम वाणी को संयमित करें, वैसे

ही डिजिटल जीवन में संयम (अनावश्यक टिप्पणी या कटु वचन से बचना) रखें.

Morning Clarity -

“नाट्काले नीराडि” – हर सुबह ध्यान/स्नान से नकारात्मकता को धोना.

Ethical      -Minimalism

 “नेय्युण्णों, पाल उण्णोम्” – अनावश्यक उपभोग से बचकर आत्मिक शुद्धि पर ध्यान देना.

Social    -Responsibility

“अय्यमुम पिच्छैयुम” – सामुदायिक सेवा, दान, भोजन वितरण.

भारतीय ज्ञान परंपरा

परंपरा

तिरुप्पावै में प्रतिध्वनि

पतंजलि योगसूत्र –

यम और –नियम

-    सत्य, अहिंसा, शौच, तप, ईश्वर-प्रणिधान - सभी का समन्वय

गीता – सात्त्विक आहार  

और तप

-    घी-दूध का त्याग = सात्त्विक संयम का अभ्यास

भक्ति-संहिता

-    सेवा, जप, और दान को भक्ति का अनिवार्य अंग बताना

उपनिषद् – आत्म-शुद्धि  का सिद्धांत

-    “स्नान” का प्रतीक - बाह्य से अधिक आंतरिक शुद्धि

आध्यात्मिक

पाशुरम् 2 में माता आंडाल भक्ति का व्यवहारिक पक्ष प्रस्तुत करती हैं. यह केवल आराधना ही नहीं, बल्कि “संयम और सेवा का योग” है. ईश्वर-भक्ति तभी साकार होती है जब मन, वाणी और कर्म तीनों शुद्ध हों.

संयम + सेवा + स्मरण = उद्धार (उय्यम्)

माता आंडाल का संदेश यह है कि- “व्रत का मूल उद्देश्य आत्मशुद्धि है.
शुद्ध मन में ही श्रीमन्नारायण का दर्शन होता है.”

“भक्ति का दूसरा चरण है -  वाणी, आहार और व्यवहार का संयम. जहाँ संयम है, वहीं साधना का सौंदर्य है. जहाँ सेवा है, वहीं श्रीकृष्ण की कृपा है.”

पहले पाशुरम् में माता आंडाल ने भक्ति का आह्वान किया है. “आओ, स्नान करें, ईश्वर-स्मरण करें.”
दूसरे पाशुरम् में वह भक्ति का अनुशासन सिखाती हैं. “संयम रखो, सेवा करो, कटु-वचन त्यागो.”
यह तिरुप्पावै की साधना की नींव है.
प्रेम + अनुशासन + सेवा + शुद्धि = भक्ति. 

जय श्री आंडाल. गोविन्दा गोविन्दा.

आंडाल तिरवडिगलै शरणं. जय श्रीमन्नारायण.




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