Sursagar, Gokulleela 79, Suradas. खेलत नन्द-आंगन गोबिंद। निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु। सूरदास

 

Sursagar, Gokulleela 79, Suradas.

खेलत नन्द-आंगन गोबिंद। निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु। सूरदास.

आचार्य एस.वी.एस.एस. नारायण राजू


प्रसंग

भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर के प्रस्तुत पद बालकृष्ण की मनोहर बाल-छवि और उनकी आकर्षक बाल-लीलाओं का अत्यंत सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है. नन्द बाबा के आँगन में खेलते हुए बालकृष्ण के रूप, वेशभूषा, आभूषणों तथा उनकी चंचल बाल-गतिविधियों का वर्णन करते हुए कवि ने वात्सल्य रस का अद्भुत सृजन किया है. माता यशोदा अपने लाड़ले पुत्र की मोहक छवि को निहारकर अपार आनंद का अनुभव कर रही हैं. भगवान की बाल-लीलाएँ इतनी मनोमुग्धकारी हैं कि उन्हें देखकर बड़े-बड़े योगी और मुनि भी अपना योग एवं वैराग्य किस प्रकार भूल जाते हैं, आदि का वर्णन अब कवि सूरदास जी के शब्दों में पद और पद की व्याख्या देखेंगे.

पद

खेलत नन्द-आंगन गोबिंद ।
निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु ।
कटि किंकिनी चंद्रिका मानिक, लटकन लटकत भाल ।
परम सुदेस कंठ केहरि-नख, बिच बिच बज्र प्रवाल ।
कर पहुँची, पाइनि मैं नूपुर, तन राजत पट पीत ।
घुटुरुनि चलत, अजिर महँ बिहरत, मुख मंडित नबनीत ।
सूर बिचित्र चरित्र स्याम के रसना कहत न आवैं ।
बाल दसा अवलोकि सकल मुनि, जोग बिरति बिसरावैं ।79

शब्दार्थ

नन्द आंगन -  नंद बाबा का आंगन

गोबिंद  -  भगवान श्रीकृष्ण

निरखि-निरखि  -  बार-बार देखकर

जसुमति  - यशोदा

इंदु  - चंद्रमाँ

कटि  - कमर

किंकिनी  - छोटी घंटियों वाली करधनी

चंद्रिका  - मस्तक पर धारण किया जाने वाला आभूषण

मानिक  - माणिक्य रत्न

लटकन  - लटकने वाला आभूषण

भाल  - मस्तक

सुदेस  - अत्यंत सुंदर

केहरि-नख  - सिंह का नाखून

बज्र  -  हीरा

प्रवाल  - मूँगा

पहुँची  -  हाथ का आभूषण (कंगन)

पाइनि  - पैरों में

नूपुर  -  पायल

पट-पीत  - पीतांबर, पीले वस्त्र

घुटुरुनि  -  घुटनों के बल

अजिर  -  आँगन

बिहरत  -  विचरण करते हुए

नवनीत  - मक्खन

बिचित्र चरित्र  -  अद्भुत लीलाएँ

रसना  - वाणी

बाल दसा  -  बाल्यावस्था

जोग  - योग

बिरति  - वैराग्य

व्याख्या

खेलत नन्द-आंगन गोबिंद .
निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु.
इस पद में सूरदास ने बालकृष्ण के सौन्दर्य, उनकी बाल-चेष्टाओं तथा माता यशोदा के वात्सल्य-भाव का अत्यंत मोहक चित्र प्रस्तुत किया है. कवि कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण नन्द बाबा के आँगन में खेल रहे हैं. वे अपनी बाल-लीलाओं में इतने रम गए हैं कि सम्पूर्ण वातावरण आनंदमय हो उठा है. माता यशोदा अपने पुत्र की इस अनुपम छवि को बार-बार निहार रही हैं और उसे देखकर उनके हृदय में अपार सुख का संचार हो रहा है. कृष्ण का मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान उज्ज्वल, शीतल और मनोहर दिखाई देता है.

कटि किंकिनी चंद्रिका मानिक, लटकन लटकत भाल.
परम सुदेस कंठ केहरि-नख, बिच बिच बज्र प्रवाल.
कवि बालकृष्ण की वेशभूषा और आभूषणों का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन करते हैं. उनकी कमर में छोटी-छोटी घंटियों वाली किंकिणी बँधी हुई है, जो उनके चलने पर मधुर ध्वनि उत्पन्न करती है. उनके मस्तक पर चन्द्रिका और माणिक्य-मणियों से युक्त सुंदर लटकन शोभायमान है. यह अलंकरण उनकी दिव्य शोभा को और अधिक आकर्षक बना देता है.

उनके गले में सिंह के नाखून से बना एक हार बँधा हुआ है, जिसे बालकों को बुरी दृष्टि से बचाने के लिए पहनाया जाता था. उस हार में हीरे और मूँगे जड़े हुए हैं, जो उसकी शोभा को और बढ़ा देते हैं. यहाँ सूरदास ने ब्रज के लोकजीवन और मातृ-संस्कारों का भी सुंदर चित्रण किया है.

कर पहुँची, पाइनि मैं नूपुर, तन राजत पट पीत.
घुटुरुनि चलत, अजिर महँ बिहरत, मुख मंडित नबनीत.
कृष्ण के हाथों में सुंदर कंगन हैं, पैरों में नूपुर हैं और उनके शरीर पर पीताम्बर सुशोभित हो रहा है. पीत वस्त्रों से अलंकृत उनका बालरूप अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता है. वे घुटनों के बल चलते हुए आँगन में इधर-उधर घूम रहे हैं. अभी वे चलना सीख रहे हैं, इसलिए उनकी प्रत्येक चेष्टा माता-पिता के लिए आनंद का स्रोत बनी हुई है.

कृष्ण के मुख पर मक्खन लगा हुआ है. यह दृश्य उनकी प्रसिद्ध माखन-लीलाओं का संकेत देता है. मक्खन से सना हुआ उनका मुख उनकी बाल-सुलभ चंचलता और निष्कपटता को व्यक्त करता है. यह दृश्य इतना आकर्षक है कि उसे देखकर किसी का भी मन मोह लिया जाए.

सूर बिचित्र चरित्र स्याम के रसना कहत न आवैं.
बाल दसा अवलोकि सकल मुनि, जोग बिरति बिसरावैं.

अंत में सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण की इन अद्भुत बाल-लीलाओं का पूर्ण वर्णन किसी की वाणी नहीं कर सकती. उनकी प्रत्येक लीला अलौकिक और अनुपम है. स्वयं माता सरस्वती भी उनके सौन्दर्य और लीलाओं का पूर्ण वर्णन करने में असमर्थ हैं.

कवि सूरदास आगे कहते हैं कि जब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भगवान के इस बाल रूप का दर्शन करते हैं, तब वे अपने योग, तपस्या और वैराग्य को भी भूल जाते हैं. जो मुनि संसार से विरक्त रहते हैं और परमात्मा की प्राप्ति के लिए कठोर साधना करते हैं, वे भी बालकृष्ण के सौन्दर्य और माधुर्य में ऐसे तल्लीन हो जाते हैं कि उनका समस्त वैराग्य प्रेम में परिवर्तित हो जाता है. यही श्रीकृष्ण की बाल-लीला की अद्भुत शक्ति है.

विशेषताएँ

1.  बालकृष्ण की मनोहर छवि का सजीव चित्रण, माता यशोदा के वात्सल्य-सुख का सुंदर निरूपण, बाल-लीलाओं और बाल-सौन्दर्य का आकर्षक वर्णन तथा भगवान के मानवीय एवं दिव्य दोनों स्वरूपों का समन्वय किया है.

2.  पूरे पद में वात्सल्य रस का अत्यंत मधुर और प्रभावशाली चित्रण हुआ है.

3.  कृष्ण के प्रति कवि की अनन्य श्रद्धा और भक्ति स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है.

4.  कृष्ण का रूप, आभूषण, चेष्टाएँ और मुस्कान पूरे पद को माधुर्य से परिपूर्ण बना देते हैं.

5.  सूरदास ने कृष्ण के आभूषणों, वस्त्रों, घुटनों के बल चलने तथा मक्खन से सने मुख का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है कि सम्पूर्ण दृश्य पाठक की आँखों के सामने साकार हो उठता है.

6.  "बदन मनोहर इंदु", कृष्ण के मुख की तुलना चन्द्रमा से की गई है. उपमा अलंकार है.

7.  "निरखि-निरखि", "लटकन लटकंत" आदि में ध्वनियों की पुनरावृत्ति है. अनुप्रास अलंकार है.

8.  "रसना कहत न आवैं", कृष्ण की लीलाओं का वर्णन वाणी से परे बताया गया है. अतिशयोक्ति अलंकार है.

9.  सरल, मधुर साहित्यिक ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग किया है.

10. गीतात्मक, गेय शैली, भावानुकूल एवं चित्रात्मक भाषा का प्रयोग किया है.

11.यह पद सूरदास की वात्सल्य-वर्णन कला का उत्कृष्ट उदाहरण है.

12. बालकृष्ण के सौन्दर्य और बाल-चेष्टाओं का अत्यंत स्वाभाविक चित्रण करता है.

13. ब्रज संस्कृति, मातृ-स्नेह और कृष्णभक्ति का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है.

14. भक्तिकालीन कृष्ण-साहित्य में इसका विशेष स्थान है.

15. प्रस्तुत पद में सूरदास ने नन्द बाबा के आँगन में खेलते हुए बालकृष्ण की अनुपम छवि का अत्यंत सजीव और मनोहारी चित्रण किया है. कृष्ण का चन्द्रमा जैसा मुख, पीताम्बर, सुंदर आभूषण, घुटनों के बल चलना और मक्खन से सना मुख पाठक के हृदय को मोह लेते हैं. माता यशोदा का वात्सल्य तथा ऋषि-मुनियों तक का कृष्ण के बालरूप पर मोहित हो जाना इस पद की भाव-समृद्धि को और अधिक बढ़ा देता है. यह पद वात्सल्य रस, माधुर्य और भक्ति का अनुपम संगम है तथा सूरदास की काव्य-प्रतिभा का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है.


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