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विभिन्न भाषा-साहित्यों का तुलनात्मक अध्ययन : कुछ प्रश्न

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विभिन्न भाषा-साहित्यों का तुलनात्मक अध्ययन   :   कुछ प्रश्न   प्रो. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू पूर्णकुंभ -   दिसंबर - 2001            समय-समय पर तुलनात्मक अध्ययन के पक्ष- विपक्ष में कई बातें सुनने का अवसर मिलता है. कभी-कभी तुलनात्मक अध्ययन को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए उसकी बडी तारीफ की जाती है तो कभी-कभी उसे गौण सिद्ध करते हुए भी विचार व्यक्त किए जाते हैं. इस अध्ययन-पद्धति के संबंध में मेरे मन में पहले से ही कई शंकाएँ हैं. मैंने अपनी सीमित बुद्धि के बल पर कई बार इन शंकाओं को निवृत्त करने का विफल प्रयास किया है. शोध-कार्य में मेरा कुछ अनुभव रहा है, कई वर्ष बीत गए. मगर मेरी शंकाएँ दूर नहीं हुईं. हमारे गुरुवर आचार्य पी. आदेश्वर राव जी अक्सर एक प्रमुख अंग्रेजी लेखक की इन पंक्तियों को उद्धत करते हैं After twenty years of writing I came to know that I have no talent for writing, by that time I become famous, so I have not left the profession. मैंने भी तुल्नात्मक अध्ययन के सहारे कई लेख प्रस्तुत किए. फिर भी इस अध्ययन...

“आज की पीढ़ी में निष्ठा कम है”

“ आज की पीढ़ी में निष्ठा कम है ” तेलुगु मूल : गाँधीवादी कवि श्री तुम्मल सीताराम मूर्ति से एम. गिरिधर राव जी का साक्षात्कार                  हिंदी अनुवाद : डॉ. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू   पूर्णकुंभ - दिसंबर 2001       आधुनिक कवियों में गाँधीवादी कवि श्री तुम्मल सीताराम मूर्ति जी अस्सी वर्षें की पूर्ति करने के बाद भी एक शारीरिक पीढ़ाओं से नतमस्तक होते हुए भी अत्यन्त निष्ठा के साथ काव्यामृत को सदा के लिए जनता को दे रहे हैं. कुछ दिन पहले अप्पीकट्टल गाँव में उनको देखने के लिए जाते समय उन्होंने कहा कि “ हर दिन बुढ़ापा बढ़ता जा रहा है. ” पत्नी और बेटे बीच-बीच में देते हुए ग्लूकोज़ का सेवन करते ही मेरे सारे प्रश्नों का उत्तर दिया है. एम. गिरिधर राव : गाँधीवादी सिद्धान्त आज भी आचरण योग्य हैं ? श्री तुम्मल सीताराम मूर्ति : गाँधीजी के सिद्धान्तों में दो प्रधान है – सत्य और अहिंसा. ये दोनों हमेशा हर समय के लिए आवश्यक है. सत्य का आचरण करने से झूठ, रिश्वत,...

संवादों की ध्वन्यात्मकता और अधूरापन : शायद और हं:

संवादों की ध्वन्यात्मकता और अधूरापन   : शायद और हं :                               प्रो. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू स्रवंति   - सितंबर - 2005                          शिल्प के स्तर पर “ शायद ” बीज नाटक विसंगत नाटक की पाश्चात्य पंरपरा से ही नहीं भारतीय नाट्यकारों से भी एक अलग ही लीक पकडता है. इस बीज नाटक के संवाद अधूरे अवश्य हैं किंतु चरित्रों के उद्घाटन में अधिक   सक्षम भी हैं. इस बीज नाटक में शिल्प के स्तर पर महत्वपूर्ण प्रयोग संवादों को दोहराये जाते है. पीडा-बोध को अभिव्यंजित करने की दृष्टि से भी यें संवाद अत्यंत महत्वूपर्ण बन पडे हैं. “ शायद ” के संवादों में जो वाक्यावली प्रयुक्त हुई है वह बहुत कुछ “ आधे-अधूरे ” की याद दिलाती है. वाक्य अधूरे से हैं..... बिन्दुओं के भरोसे छोड दिये गये हैं फिर भी पाठक के मन को भरमाते नहीं है ए...