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दांपत्य जीवन पर छानेवाले मानसिक तनाव की शाब्दिक अभिव्यक्ति “शायद” और “हां:”

  दांपत्य जीवन पर छानेवाले मानसिक तनाव की शाब्दिक अभिव्यक्ति “ शायद ” और “ हां :”                                     डॉ . एस . वी . एस . एस . नारायण राजू स्रवंति जनवरी 2005 प्रयोगधर्मी रचनाकार मोहन राकेश ने पूर्ण नाटकों के साथ ही कुछ छोटे नाट्यप्रयोग भी कि ए जो “ बीज नाटक ” के नाम से धर्मयुग   में “ शायद ” 12 फरवरी और “ हं :” 13 अगस्त 1967 में प्रकाशित हुए थे | बीज नाटक से उनका क्या तात्पर्य है , इस विषय में उन्होंनें कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है | किन्तु इन दोनों नाटकों के कथ्य व शिल्प का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान युग के पारिवारिक विघटन , व्यक्ति के अकेलेपन , मानवीय संबंधों और जीवन मूल्य के जिस विघटित रूप को आज की भाषा में “ आधे - अधूरे ” में मूर्त करने का प्रयत्न किया गया है , उसी का पूर्व एवं संक्षिप्त रूप इन दो नाटकों में बीज रूप में दिखाई देते हैं ...

संस्कृति : एक परिचय

संस्कृति : एक परिचय                                                  प्रो. एस . वी . एस . एस . नारायण राजू स्रवंति , मई   2005     संस्कृति का कोशार्थ   इस प्रकार है – पूरा करना , शुध्दि , सुधार , परिष्कार , निर्माण , पवित्रीकरण , सजावट , निश्चय , उद्योग , आचरणगत परंपरा , सभ्यता का वह स्वरुप जो आध्यात्मिक एवं मानसिक वैशिष्ट्य का द्योतक होता है ; 24 ( चौबीस ) अक्षरों के वर्णवृत्त। (1) संस्कृति शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है। एक विस्तृत और एक सीमित अर्थ में होता है। विस्तृत अर्थ में संस्कृति शब्द का प्रयोग नर विज्ञान में किया जाता है। ‘ नर विज्ञान ’ के अनुसार संस्कृति सीखे हुए व्यवहार अथवा सामाजिक परंपरा से प्राप्त होता है। संस्कृति को सामाजिक प्रथा ( custom) का पर्याय भी कहा जाता है...